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हाशिए पर नहीं समृद्ध हो रहा रंगमंच
Updated Tue, 27 Mar 2018 02:40 AM IST
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टैगोर थिएटर में लोक गाथा
- फोटो : amar ujala
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रंगकर्मियों का मानना है कि टीवी, नेट, सोशल मीडिया के दौर में भी रंगमंच के प्रति लोगों में आकर्षण हैं। रंगमंच के नाटकों को देखने के लिए भीड़ उमड़ रही है। एक बार दिखाए गए नाटक की बार-बार मांग की जा रही है। रंगमंच आज के दौर में और भी समृद्ध हो रहा है। कमी है तो केवल सुविधाओं की। रंगमंचीय कलाकारों को उभारने के लिए एक अदद आडिटोरियम तक नहीं बनाया गया है। सरकारों की ओर से रंगमंच को किसी तरह का सहयोग और सुविधाएं नहीं मिलती हैं। कैलाश पाठक की रिपोर्ट-
नाटक ही जीवन की संपूर्ण कला है
रंगमंच पूर्ववर्ती नौटंकी शैली का एक द्योतक रहा है। हिंदी रंगमंच और कुमाऊं रंगमंच कमोबेश एक ही हैं। भरत मुनि का नाट्य शिल्प ‘न तद् ज्ञानम, न तद् शिल्पम, न सा विद्या न सा कला, न सहयोग: न तत्कर्म:, नाट्ये स्मिन यन्न दृश्यते’ यानी न कोई ऐसा ज्ञान, न कोई ऐसा शिल्प, न कोई ऐसी विद्या, न ऐसी कोई कला, न कोई ऐसा योग, न कोई ऐसा कर्म, जो नाटक में दिखता न हो, ऐसा नहीं है।
घनश्याम भट्ट प्रसिद्ध रंगकर्मी
उत्तराखंड को नशामुक्त बना देंगे
वर्तमान में कहानियों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे दर्शकों को वास्तविकता से रूबरू होने का अवसर मिल रहा है। तीन घंटे की फिल्में अब एक घंटे में सिमट कर रह गई हैं। सरकारें रंगमंच के लिए सुविधाएं और सहयोग करे तो आज नशे के आगोश में डूब चुके उत्तराखंड को नशामुक्त बना देंगे।
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हरीश चंद्र पांडे रंगकर्मी
युगमंच ने कुमाऊं में रंगमंच की शानदार शुरुआत की। जो आज भी जीवंत है। जन कवि गिरदा की कमी रंगमंच को आज भी खलती है। उनका ततुक नी लगा उदेख, घुनई मुनई नी टेक जैता एक दिन तौ आलो उ दिन यो दुनि में गीत आज भी लोगों के कानों में गूंजता है।
जहूर आलम रंगकर्मी
इन नाटकों होती है ज्यादा मांग
रंगमंचीय नाटकों में जुगल किशोर पेटशाली का राजुला मालूशाही, अस्तित्व लोक कला विकास समिति का पांच लोफर, कथा कुमाऊं की, शैलेश मटियानी लिखित दो दुखों का एक सुख, मनोहर श्याम जोशी का कसप, हिमांशु जोशी की कगार की आग, बृजेंद्र लाल साह का रमौल, राजेंद्र बोरा का भाना गंगनाथ, मणि मधुकर का रसगंधर्व। दो दुखों का एक सुख, कथा कुमाऊं और पांच लोफर, डॉ. शंकर शेष का चेहरे और आधुनिक व्यवस्था पर ‘एक और द्रोणाचार्य’, युगमंच की अंधेर नगरी, ललित पंत द्वारा निर्देशित धरमवीर भारती का अंधा युग, भारत दुर्दशा, नगाड़े खामोश हैं। शैलनट हल्द्वानी के रावी पार, घर कहां है, मुआवजे, दस दिन, नीला घोड़ा, ठुल ठलिया, एक कौआ, दो ठग आदि।
रंगमंच से निकलकर फिल्मों में पहुंचे कलाकार
निर्मल पांडे, ललित तिवारी, गोविंद पांडे, हिमानी शिवपुरी, हेमंत पांडे, श्रीष डोभाल।
कुली बेगार, नशा नहीं रोजगार दो, चिपको आंदोलन, उत्तराखंड आंदोलन
हल्द्वानी। कुमाऊं में चले कुली बेगार, नशा नहीं रोजगार दो और चिपको आंदोलनों को रंगमंच के नाटकों का धार दी है। इनमें जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा का विशेष योगदान रहा है।
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नाटक ही जीवन की संपूर्ण कला है
रंगमंच पूर्ववर्ती नौटंकी शैली का एक द्योतक रहा है। हिंदी रंगमंच और कुमाऊं रंगमंच कमोबेश एक ही हैं। भरत मुनि का नाट्य शिल्प ‘न तद् ज्ञानम, न तद् शिल्पम, न सा विद्या न सा कला, न सहयोग: न तत्कर्म:, नाट्ये स्मिन यन्न दृश्यते’ यानी न कोई ऐसा ज्ञान, न कोई ऐसा शिल्प, न कोई ऐसी विद्या, न ऐसी कोई कला, न कोई ऐसा योग, न कोई ऐसा कर्म, जो नाटक में दिखता न हो, ऐसा नहीं है।
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घनश्याम भट्ट प्रसिद्ध रंगकर्मी
उत्तराखंड को नशामुक्त बना देंगे
वर्तमान में कहानियों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे दर्शकों को वास्तविकता से रूबरू होने का अवसर मिल रहा है। तीन घंटे की फिल्में अब एक घंटे में सिमट कर रह गई हैं। सरकारें रंगमंच के लिए सुविधाएं और सहयोग करे तो आज नशे के आगोश में डूब चुके उत्तराखंड को नशामुक्त बना देंगे।
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हरीश चंद्र पांडे रंगकर्मी
युगमंच ने कुमाऊं में रंगमंच की शानदार शुरुआत की। जो आज भी जीवंत है। जन कवि गिरदा की कमी रंगमंच को आज भी खलती है। उनका ततुक नी लगा उदेख, घुनई मुनई नी टेक जैता एक दिन तौ आलो उ दिन यो दुनि में गीत आज भी लोगों के कानों में गूंजता है।
जहूर आलम रंगकर्मी
इन नाटकों होती है ज्यादा मांग
रंगमंचीय नाटकों में जुगल किशोर पेटशाली का राजुला मालूशाही, अस्तित्व लोक कला विकास समिति का पांच लोफर, कथा कुमाऊं की, शैलेश मटियानी लिखित दो दुखों का एक सुख, मनोहर श्याम जोशी का कसप, हिमांशु जोशी की कगार की आग, बृजेंद्र लाल साह का रमौल, राजेंद्र बोरा का भाना गंगनाथ, मणि मधुकर का रसगंधर्व। दो दुखों का एक सुख, कथा कुमाऊं और पांच लोफर, डॉ. शंकर शेष का चेहरे और आधुनिक व्यवस्था पर ‘एक और द्रोणाचार्य’, युगमंच की अंधेर नगरी, ललित पंत द्वारा निर्देशित धरमवीर भारती का अंधा युग, भारत दुर्दशा, नगाड़े खामोश हैं। शैलनट हल्द्वानी के रावी पार, घर कहां है, मुआवजे, दस दिन, नीला घोड़ा, ठुल ठलिया, एक कौआ, दो ठग आदि।
रंगमंच से निकलकर फिल्मों में पहुंचे कलाकार
निर्मल पांडे, ललित तिवारी, गोविंद पांडे, हिमानी शिवपुरी, हेमंत पांडे, श्रीष डोभाल।
कुली बेगार, नशा नहीं रोजगार दो, चिपको आंदोलन, उत्तराखंड आंदोलन
हल्द्वानी। कुमाऊं में चले कुली बेगार, नशा नहीं रोजगार दो और चिपको आंदोलनों को रंगमंच के नाटकों का धार दी है। इनमें जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा का विशेष योगदान रहा है।