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उत्तराखंडः गवर्नर 'सर' की सरकार ने बदला सचिवालय का नजारा
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 29 Mar 2016 10:45 AM IST
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केके पॉल
- फोटो : anil dogra
उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को लागू हुए 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि सचिवालय का नजारा बदला हुआ नजर आया।
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सब अनुशासित और चौकन्ने हैं। एफआरडीसी बिल्डिंग के पास गपबाजी नहीं हो रही। अनुभागों की अलमारियों के कोने में सालों से धूल फांक रहीं फाइलों के दिन बहुर आए हैं। इन्हें अब साफ किया जा रहा है। अफसर अपनी पुरानी डायरी में दर्ज मामलों को नए कागज पर नोट कर रहे हैं। कहते हैं-राष्ट्रपति शासन लागू हो गया है। ‘पता नहीं गवर्नर सर कौन-सी फाइल तलब कर लें।’
प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू होने के पहले कार्य दिवस सोमवार को इस बदलाव का अहसास सचिवालय के बाहर से होने लगा था। मुख्य गेट के सामने सड़क के दोनों तरफ चूने की लाइन हैं। बाउंड्री के किनारे आज कारें बड़ी तरतीब से खड़ी हैं। ऐसा ही नजारा अंदर भी है।
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सचिवालय में छोटा या बड़ा कोई नेता नजर नहीं आ रहा
गवर्नर केके पॉल
- फोटो : amar ujala
सचिवालय परिसर में छोटा या बड़ा कोई नेता नजर नहीं आ रहा है। अक्सर एटीएम चौराहे पर वक्त गुजारने वाले अधिकारी यहां नहीं हैं। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अपने अधिकारियों के चैंबर के बाहर बेंच पर अटेंशन वाली मुद्रा में है। अनुभागों के अंदर दिलचस्प दृश्य है। फाइलों को मानो पुचकार कर साफ किया जा रहा है।
अधिकारी कहते हैं कि नेताओं के सिफारिशी काम के चक्कर में फाइलों पर काम ही नहीं हो पाया। पता नहीं कौन-सी फाइल कब तलब कर ली जाए। बता दें कि यह सारी फाइलें जनसमस्याओं की हैं, जिन्हें अफसरों की नोटिंग के बाद डेढ़-दो साल पहले शासन को भेजा गया था।
एक आला अधिकारी बोले कि सुबह से शाम तक इतनी भीड़ लग जाती थी कि देख ही नहीं पाते थे। सॉरी बोलो तो लोग किसी मंत्री का नंबर मिला कर फोन थमा देते थे कि बात कर लीजिये। नेता कम आएंगे तो राहत मिलेगी। राष्ट्रपति शासन लगने से कम से कम कार्य संस्कृति बदली तो।
अधिकारी कहते हैं कि नेताओं के सिफारिशी काम के चक्कर में फाइलों पर काम ही नहीं हो पाया। पता नहीं कौन-सी फाइल कब तलब कर ली जाए। बता दें कि यह सारी फाइलें जनसमस्याओं की हैं, जिन्हें अफसरों की नोटिंग के बाद डेढ़-दो साल पहले शासन को भेजा गया था।
एक आला अधिकारी बोले कि सुबह से शाम तक इतनी भीड़ लग जाती थी कि देख ही नहीं पाते थे। सॉरी बोलो तो लोग किसी मंत्री का नंबर मिला कर फोन थमा देते थे कि बात कर लीजिये। नेता कम आएंगे तो राहत मिलेगी। राष्ट्रपति शासन लगने से कम से कम कार्य संस्कृति बदली तो।