फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Kotdwar News ›   The number of vultures increased due to the efforts of teacher Dinesh

शिक्षक दिनेश के प्रयासों से बढ़ी गिद्धों की संख्या

Sat, 12 Nov 2022 10:57 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sat, 12 Nov 2022 10:57 PM IST
विज्ञापन
The number of vultures increased due to the efforts of teacher Dinesh
विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके गिद्धों के संरक्षण और संवर्द्धन में जुटे शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती के प्रयास अब रंग लाने लगे हैं। द्वारीखाल, रिखणीखाल और नैनीडांडा में कई जगहों के निरीक्षण के बाद उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में अब पुन: गिद्धों के झुंड दिखाई दे रहे हैं। यहां करीब 40 गिद्ध दिखाई दिए हैं। बता दें कि दिनेश चंद अपने वेतन का एक हिस्सा पक्षी संरक्षण के कार्य पर खर्च करते हैं।
विज्ञापन

रिखणीखाल ब्लॉक के अंतर्गत राजकीय इंटर कॉलेज द्वारी पैनो में तैनात शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती ने वर्ष 1997 से गौरेया बचाव मुहिम शुरू की थी। वर्ष 2010 में उनका ध्यान गिद्धों की ओर गया तो देखा अब गिद्ध बहुत कम संख्या में बचे हैं। इसके बाद उन्होंने गिद्ध बचाव अभियान को भी अपनी मुहिम का हिस्सा बना लिया। उन्होंने लोगों के गिद्ध बचाव के प्रति गोष्ठियां कर जागरूक किया। बताया कि मृत मवेशियों पर कीटनाशक न डालें, वनों में आग न लगने दें ताकि गिद्धों को पर्याप्त भोजन मिल सके। उनके इन प्रयासों से द्वारीखाल, रिखणीखाल और नैनीडांडा ब्लॉक की पहाड़ियां आज गिद्ध संरक्षण केंद्र के रूप में उबरकर सामने आई हैं। यहां लगातार गिद्धों की संख्या बढ़ रही है। द्वारीखाल के कुंटी गांव के खम्डल पहाड़ी में करीब 14 गिद्ध, जबकि रिखणीखाल और नैनीडांडा ब्लॉक के मध्य टांडियों जंगल में बलदौं की झुंटी में 26 गिद्ध दिखाई दिए हैं। 60 से अधिक गांव उनकी इस मुहिम के साथ जुड़ चुके हैं। इस काम में ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों, वन पंचायत के प्रधानों, पूर्व प्रधानों, महिला व युवक मंगल दलों का उन्हें भरपूर साथ मिला है।
विज्ञापन

विलुप्ति का मुख्य कारण कीटनाशकों का प्रयोग
कोटद्वार शिक्षक दिनेश कुकरेती बताते हैं कि 1985 से 1991 के बीच 90 फीसदी जबकि 2022 तक 99 फीसदी गिद्ध समाप्त हुए। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में पहले गिद्धों की नौ से 10 प्रजातियां दिखाई देती थीं जो अब महज तीन से चार ही रह गई हैं। उनका मानना है कि ग्रामीण जंगली जानवरों को मारने के लिए मृत मवेशियों पर कीटनाशक का प्रयोग करते हैं, जिसे खाकर गिद्धों के झुंड समाप्त हो गए।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed