{"_id":"677d5f0793dacf8234096270","slug":"congress-and-bjp-struggling-with-factionalism-and-infighting-problems-for-candidates-increased-kotdwar-news-c-5-1-gkp1010-588612-2025-01-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kotdwar News: गुटबाजी, भितरघात से जूझ रही कांग्रेस और भाजपा, प्रत्याशियों की बढ़ी मुश्किलें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kotdwar News: गुटबाजी, भितरघात से जूझ रही कांग्रेस और भाजपा, प्रत्याशियों की बढ़ी मुश्किलें
विज्ञापन
विज्ञापन
कोटद्वार। कोटद्वार में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां जबरदस्त गुटबाजी से जूझ रही हैं। जिसके कारण नगर निगम चुनाव में दोनों दलों के प्रत्याशियों को गुटबाजी के साथ ही भितरघात से पार पाना मुश्किल हो रहा है। जैसे-जैसे चुनाव प्रचार जोर पकड़ रहा है, वैसे-वैसे गुटबाजी और भितरघात भी खुलकर सामने आने लगा है। ऐसे में दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों के माथे पर बल पड़े हुए हैं। हालांकि अभी स्टार प्रचारक और बड़े नेताओं की इंट्री चुनाव प्रचार में नहीं हुई है।भाजपा प्रत्याशी शैलेंद्र सिंह रावत की बात करें तो वर्ष 2012 में भाजपा ने उनके स्थान पर तत्कालीन सिटिंग मुख्यमंत्री मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी (से.नि.) को कोटद्वार विधानसभा से प्रत्याशी बनाया। तब भितरघात के चलते खंडूड़ी कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नेगी से चुनाव हार गए। शैलेंद्र सिंह रावत पर भितरघात के आरोप लगे और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
दो साल बाद लोकसभा चुनाव के दौरान मार्च, 2014 में पुन: उनकी पार्टी में वापसी हुई। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी से टिकट न मिलने पर वह नाराज होकर कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने यमकेश्वर विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर 2017 व 2022 का चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
जनवरी, 2024 में नगर निगम चुनाव की सुगबुगाहट होते ही कांग्रेस छोड़कर पुन: वह भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा में शामिल होते ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि उन्हें मेयर का टिकट दिया जाएगा। हुआ भी यही, नगर निगम चुनाव में पार्टी ने उन्हें मेयर का प्रत्याशी बनाया है, लेकिन यहां कुछ नेता और कार्यकर्ताओं को वे रास नहीं आ रहे हैं।
विज्ञापन
यही कारण है कि चुनाव की तिथि नजदीक आते ही पार्टी की गुटबाजी सतह पर आ गई है। पार्टी के कई कार्यकर्ता निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में मेयर और सभी 40 पार्षद प्रत्याशियों की जीत का सपना संजोए भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पार्टी की ओर से रूठे लोगों को मनाने व निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे कार्यकर्ताओं से पार पाने के लिए खासे पापड़ बेलने पड़ रहे हैं।
कमोवेश यही हाल कांग्रेस पार्टी की बनी है। यहां कांग्रेस की प्रत्याशी रंजना रावत की भी इस मामले में मुश्किलें काफी बढ़ी हुई हैं। कांग्रेस के दो धड़े बने हुए हैं। कांग्रेस का पहला धड़ा जहां रंजना रावत का समर्थन कर रहा है।
वहीं, दूसरा धड़ा पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी से जुड़ा हुआ है। पार्टी प्रत्याशी रंजना रावत और पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी के बीच भी वर्ष 2018 के मेयर चुनाव से ही मतभेद चल रहे हैं। वर्ष 2018 के निगम चुनाव में रंजना रावत, पूर्व ब्लॉक प्रमुख गीता नेगी और महिला कांग्रेस की तत्कालीन प्रदेश सचिव कृष्णा बहुगुणा ने भी दावेदारी की थी।
पार्टी में टिकट को लेकर गतिरोध को देखते हुए तब पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की धर्मपत्नी हेमलता नेगी को मेयर का प्रत्याशी बनाया था। वह जीत हासिल कर पहली मेयर बनी। नामांकन व हाल ही में सिमलचौड़ में हुई बैठक के दौरान कद्दावर नेता पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी नहीं दिखे। जिससे कांग्रेस में भी गुटबाजी और भितरघात भी चर्चा आम है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी रंजना रावत को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए रूठे हुए लोगों को मनाना चुनौती से कम नहीं है।
दो साल बाद लोकसभा चुनाव के दौरान मार्च, 2014 में पुन: उनकी पार्टी में वापसी हुई। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी से टिकट न मिलने पर वह नाराज होकर कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने यमकेश्वर विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर 2017 व 2022 का चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
विज्ञापन
जनवरी, 2024 में नगर निगम चुनाव की सुगबुगाहट होते ही कांग्रेस छोड़कर पुन: वह भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा में शामिल होते ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि उन्हें मेयर का टिकट दिया जाएगा। हुआ भी यही, नगर निगम चुनाव में पार्टी ने उन्हें मेयर का प्रत्याशी बनाया है, लेकिन यहां कुछ नेता और कार्यकर्ताओं को वे रास नहीं आ रहे हैं।
विज्ञापन
यही कारण है कि चुनाव की तिथि नजदीक आते ही पार्टी की गुटबाजी सतह पर आ गई है। पार्टी के कई कार्यकर्ता निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में मेयर और सभी 40 पार्षद प्रत्याशियों की जीत का सपना संजोए भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पार्टी की ओर से रूठे लोगों को मनाने व निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे कार्यकर्ताओं से पार पाने के लिए खासे पापड़ बेलने पड़ रहे हैं।
कमोवेश यही हाल कांग्रेस पार्टी की बनी है। यहां कांग्रेस की प्रत्याशी रंजना रावत की भी इस मामले में मुश्किलें काफी बढ़ी हुई हैं। कांग्रेस के दो धड़े बने हुए हैं। कांग्रेस का पहला धड़ा जहां रंजना रावत का समर्थन कर रहा है।
वहीं, दूसरा धड़ा पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी से जुड़ा हुआ है। पार्टी प्रत्याशी रंजना रावत और पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी के बीच भी वर्ष 2018 के मेयर चुनाव से ही मतभेद चल रहे हैं। वर्ष 2018 के निगम चुनाव में रंजना रावत, पूर्व ब्लॉक प्रमुख गीता नेगी और महिला कांग्रेस की तत्कालीन प्रदेश सचिव कृष्णा बहुगुणा ने भी दावेदारी की थी।
पार्टी में टिकट को लेकर गतिरोध को देखते हुए तब पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की धर्मपत्नी हेमलता नेगी को मेयर का प्रत्याशी बनाया था। वह जीत हासिल कर पहली मेयर बनी। नामांकन व हाल ही में सिमलचौड़ में हुई बैठक के दौरान कद्दावर नेता पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी नहीं दिखे। जिससे कांग्रेस में भी गुटबाजी और भितरघात भी चर्चा आम है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी रंजना रावत को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए रूठे हुए लोगों को मनाना चुनौती से कम नहीं है।