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भवन तो बन गए, कहां है इसके 'भगवान'?
संदीप थपलियाल/ अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
Updated Fri, 29 Nov 2013 06:31 PM IST
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वर्ष 2006 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में जिला अस्पताल भवन का लोकार्पण किया था। तब आस जगी थी कि अस्पताल में मरीजों को सुविधाएं हासिल होंगी। लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव में यह अस्पताल रेफर सेंटर बन कर रह गया।
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भवन खड़ा करने से कुछ नहीं होगा
आज छह वर्ष बाद उन्होंने बतौर स्वास्थ्य मंत्री सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ऊखीमठ के भवन का लोकार्पण किया। लोग फिर आस लगाए बैठे हैं कि अब उन्हे इलाज के लिए भटकना नहीं पडे़गा। लेकिन लोग यह भी जानते हैं कि सिर्फ भवन खड़ा करने से कुछ नहीं होगा।
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अस्पताल में डॉक्टर तो बैठाने पड़ेंगे। जो काफी मुश्किल है। बिना डॉक्टरों के गांव के एलौपेथिक स्वास्थ्य केंद्र से अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, यहां से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, यहां से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, यहां से भी जिला अस्पताल मरीज को रेफर होना ही पडे़गा।
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श्रीकोट में भी इलाज नहीं हो पाता
बात यही खत्म नहीं होती, जिला अस्पताल से मरीज को बेस अस्पताल श्रीकोट भेजा जाता है। वहां भी इलाज नहीं हो पाता। इसके बाद मरीज के तीमारदार अपनी हैसियत के अनुरुप जॉलीग्रांट, देहरादून, चंडीगढ़ या दिल्ली ले जाएंगे।
यदि जिले में डॉक्टरों की स्थिति देखेंगे, तो अंदाजा लग जाएगा कि सिर्फ सीमेंट और ईंट की दीवार बनाने से काम नहीं चलेगा। डॉक्टर ज्यादा जरुरी हैं।
जिला अस्पताल को मिलाकर जिले में चिकित्सकों के 88 पद सृजित हैं। लेकिन तैनात हैं सिर्फ 19 डॉक्टर। यानि कि 69 डॉक्टरों की कमी है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की है जरुरत
अस्पतालों में ईएनटी सर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और जनरल सर्जन के पद खाली चल रहे हैं। जिले में दो डॉक्टर ऐसे हैं, जिनकी मानसिक हालात को देखते हुए उन्हे दूरस्थ क्षेत्रों में तैनात किया हुआ है।
संस्थाएं दे डॉक्टर
आपदा के बाद विभिन्न संस्थाएं स्वास्थ्य क्षेत्र में मदद को आगे आई हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक बैशाखी के सहारे लोगों की सेहत देखी जाएगी।
संस्थाओं का ज्यादा जोर अपने स्वयं के मेडिकल कैंप पर रहता है। बेहतर रहता कि भवन निर्माण या कैंप लगाने के बजाय संस्थाएं अपने खर्चे से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की व्यवस्था करती।