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प्रयाग में फिर उठेगा भू-समाधि का मुद्दा
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Sat, 19 Nov 2016 11:19 PM IST
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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एक बार फिर से नदियों को पवित्र बनाने के लिए संतों की जल समाधि रोकने की मांग करेगी। 28 नवंबर को प्रयाग में होने वाली परिषद की बैठक में यह मुद्दा उठाया जाएगा। पहले भी कई बार परिषद के प्रस्तावों पर सरकारों ने सहमति तो प्रदान की लेकिन भू समाधि के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराई।
शनिवार को अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हरी गिरी ने बताया कि सभी तीर्थों पर पवित्र नदियों में संन्यासियों के शवों को जल समाधि प्रदान की जाती है। वैरागियों, उदासियों और निर्मलों में जलाने की परंपरा है। अखाड़ा परिषद चाहती है कि सभी तीर्थों पर भू समाधि के लिए उपयुक्त स्थल मिल जाए। ताकि शवों का जल समाधि न देनी पड़े। इसके लिए पहली बार वर्ष 2010 में हरिद्वार के कुंभ में विधिवत प्रस्ताव पारित कर उत्तराखंड सरकार के साथ-साथ केंद्र को भी भेजा गया था। बाद में ऐसे ही प्रस्ताव काशी, प्रयाग, उज्जैन, नासिक, अहमदाबाद और मुंबई आदि स्थलों पर भी अखाड़ा परिषदों की बैठकों में पारित किए गए। कई राज्य सरकारों ने जमीन उपलब्ध कराने की पहल की। उत्तराखंड सरकार ने स्थल निरीक्षण कराकर 100 हेक्टेयर भूमि देने का आदेश भी दिया था। उसके बावजूद किसी सरकार ने भूमि नहीं दी। कई अभियानों के बावजूद गंगा आदि पवित्र नदियां प्रदूषित हो रही हैं।
प्रयाग रवाना होने से पूर्व श्रीमहंत हरी गिरी ने बताया कि इस संबंध में सभी अखाड़ों के बीच पूर्ण सहमति है। आश्रम परिषद, भारत साधु समाज आदि संतों के अन्य संगठन भी ऐसे प्रस्ताव पारित कर चुके हैं। अब नए सिरे से इस दिशा में प्रयास शुरू होगा। उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारों ने भी ऐसे प्रस्तावों को समर्थन प्रदान किया था। अखाड़ा परिषद केंद्र से भी मांग करेगी कि सरकार अपने स्तर से इस प्रयास को सफल बनाए।
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शनिवार को अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हरी गिरी ने बताया कि सभी तीर्थों पर पवित्र नदियों में संन्यासियों के शवों को जल समाधि प्रदान की जाती है। वैरागियों, उदासियों और निर्मलों में जलाने की परंपरा है। अखाड़ा परिषद चाहती है कि सभी तीर्थों पर भू समाधि के लिए उपयुक्त स्थल मिल जाए। ताकि शवों का जल समाधि न देनी पड़े। इसके लिए पहली बार वर्ष 2010 में हरिद्वार के कुंभ में विधिवत प्रस्ताव पारित कर उत्तराखंड सरकार के साथ-साथ केंद्र को भी भेजा गया था। बाद में ऐसे ही प्रस्ताव काशी, प्रयाग, उज्जैन, नासिक, अहमदाबाद और मुंबई आदि स्थलों पर भी अखाड़ा परिषदों की बैठकों में पारित किए गए। कई राज्य सरकारों ने जमीन उपलब्ध कराने की पहल की। उत्तराखंड सरकार ने स्थल निरीक्षण कराकर 100 हेक्टेयर भूमि देने का आदेश भी दिया था। उसके बावजूद किसी सरकार ने भूमि नहीं दी। कई अभियानों के बावजूद गंगा आदि पवित्र नदियां प्रदूषित हो रही हैं।
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प्रयाग रवाना होने से पूर्व श्रीमहंत हरी गिरी ने बताया कि इस संबंध में सभी अखाड़ों के बीच पूर्ण सहमति है। आश्रम परिषद, भारत साधु समाज आदि संतों के अन्य संगठन भी ऐसे प्रस्ताव पारित कर चुके हैं। अब नए सिरे से इस दिशा में प्रयास शुरू होगा। उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारों ने भी ऐसे प्रस्तावों को समर्थन प्रदान किया था। अखाड़ा परिषद केंद्र से भी मांग करेगी कि सरकार अपने स्तर से इस प्रयास को सफल बनाए।
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