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कभी यूनिफार्म तो कभी बदल जाता है पाठ्यक्रम

Sat, 23 Apr 2022 01:03 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sat, 23 Apr 2022 01:03 AM IST
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Sometimes the uniform and sometimes the course changes
निजी स्कूलों की ओर से कभी ड्रेस और कभी पाठ्यक्रम बदलकर अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। इसके कारण एक साल बाद ही जहां किताबें बेकार हो जा रही हैं। वहीं, ड्रेस भी किसी काम के नहीं आ रही हैं।
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निजी स्कूलों की मनमानी फीस वसूली ही नहीं, बल्कि हर साल पाठ्यक्रम से लेकर यूनिफार्म बदलने के खेल होता है। इसमें अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता है। पुरानी किताबों को न तो अभिभावक अपने छोटे बच्चों को दे पाते हैं और न ही अन्य बच्चों के काम आ पाती हैं। उन्हें हर साल नई किताबों को खरीदना पड़ता है। ड्रेस में भी हर साल कुछ न कुछ बदलाव कर दिया जाता है। इससे हर साल नई खरीदने पड़ती है। अभिभावकों पर हर साल ड्रेस और किताबों का बोझ झेलना पड़ रहा है। सुभाषनगर निवासी हेमा का कहना है कि अभिभावकों की चुप्पी का फायदा ही स्कूल वाले उठा रहे हैं। जबकि इनकी हठधार्मिता को रोकने के लिए अभिभावकों को आगे आना चाहिए। भेल रविंद्र कुमार, सिडकुल जीवन सिंह और सुभाषनगर रश्मि का कहना है कि स्कूलों में कम से कम पांच साल तक एक पाठ्यक्रम और ड्रेस रहनी चाहिए। बार-बार बदलाव होने से आर्थिक बोझ बढ़ता है।
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