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जिला अस्पताल, ईएनटी और त्वचा के मरीज लाचार
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जिला अस्पताल में नाक, कान, गला और त्वचा रोग से पीडितों के इलाज की सुविधा नहीं है। मानसून सीजन में त्वचा और ईएनटी से जुड़ी समस्याएं बढ़ जाती हैं। मरीज जिला अस्पताल पहुंचने के बाद निराश लौट रहे हैं। अस्पताल में त्वचा और ईएनटी विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद सृजित तो हैं, लेकिन सालों से तैनाती नहीं हैं। मरीजों को निजी अस्पतालों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
हरिद्वार की आबादी तेजी से बढ़ रही है। शहर और सटे इलाकों में करीब दस लाख की आबादी है। बावजूद इसके जिला मुख्यालय का सरकारी अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। कोविड की दूसरी लहर कमजोर पड़ने के बाद ओपीडी में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अस्पताल में सृजित पदों की तुलना में डॉक्टर और चिकित्सा स्टाफ नहीं है। संसाधनों का भी अकाल है। पर्चा बनवाने से लेकर ओपीडी में दिखाने और फिर जांच करवाने और दवाएं लेने के लिए मरीजों एवं तीमारदारों को घंटों लाइन में लगना पड़ता है।
अस्पताल में ईएनटी विशेषज्ञ का पद तीन साल से खाली है। जबकि त्वचा रोग विशेषज्ञ भी एक साल से नहीं है। बारिश के सीजन में नाक, कान, गला और स्किन के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। बारिश में भीगने पर कान में पानी घुसने से दर्द की आम शिकायत रहती है। जबकि धूप निकलने पर उमस होने से त्वचा से संबंधित शरीर में फोड़े, फुंसी, एलर्जी और लाल चकत्ते पड़ने की समस्या होती है। अस्पताल की ओपीडी तक ऐसे मरीज पहुंच रहे हैं। पर्चा काउंटर से कुछ मरीजों को जरनल फिजिशियन की ओपीडी भेज दिया जाता है तो अधिकतर लोगों को डाक्टर नहीं होने की बात बोलकर वापस लौटा दिया जाता है। जरनल फिजिशियन के दो पद सृजित हैं, लेकिन एक की ही तैनाती है। हर मर्ज का इलाज फिजिशियन के भरोसे है।
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ईएनटी और स्किन स्पेशलिस्ट चिकित्सक के पद स्वीकृत हैं। लेकिन तैनाती नहीं है। इससे मरीजों को दूसरे निजी अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। ईएनटी और त्वचा रोग विशेषज्ञ की तैनाती के लिए पत्राचार किया गया है।
- डॉ. राजेश गुप्ता, प्रभारी सीएमएस, जिला अस्पताल
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हरिद्वार की आबादी तेजी से बढ़ रही है। शहर और सटे इलाकों में करीब दस लाख की आबादी है। बावजूद इसके जिला मुख्यालय का सरकारी अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। कोविड की दूसरी लहर कमजोर पड़ने के बाद ओपीडी में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अस्पताल में सृजित पदों की तुलना में डॉक्टर और चिकित्सा स्टाफ नहीं है। संसाधनों का भी अकाल है। पर्चा बनवाने से लेकर ओपीडी में दिखाने और फिर जांच करवाने और दवाएं लेने के लिए मरीजों एवं तीमारदारों को घंटों लाइन में लगना पड़ता है।
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अस्पताल में ईएनटी विशेषज्ञ का पद तीन साल से खाली है। जबकि त्वचा रोग विशेषज्ञ भी एक साल से नहीं है। बारिश के सीजन में नाक, कान, गला और स्किन के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। बारिश में भीगने पर कान में पानी घुसने से दर्द की आम शिकायत रहती है। जबकि धूप निकलने पर उमस होने से त्वचा से संबंधित शरीर में फोड़े, फुंसी, एलर्जी और लाल चकत्ते पड़ने की समस्या होती है। अस्पताल की ओपीडी तक ऐसे मरीज पहुंच रहे हैं। पर्चा काउंटर से कुछ मरीजों को जरनल फिजिशियन की ओपीडी भेज दिया जाता है तो अधिकतर लोगों को डाक्टर नहीं होने की बात बोलकर वापस लौटा दिया जाता है। जरनल फिजिशियन के दो पद सृजित हैं, लेकिन एक की ही तैनाती है। हर मर्ज का इलाज फिजिशियन के भरोसे है।
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ईएनटी और स्किन स्पेशलिस्ट चिकित्सक के पद स्वीकृत हैं। लेकिन तैनाती नहीं है। इससे मरीजों को दूसरे निजी अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। ईएनटी और त्वचा रोग विशेषज्ञ की तैनाती के लिए पत्राचार किया गया है।
- डॉ. राजेश गुप्ता, प्रभारी सीएमएस, जिला अस्पताल