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ण्ण्ण्अक्षय तृतीया पर पुण्य भी अक्षय और पाप भी
Updated Tue, 17 Apr 2018 11:52 PM IST
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हरिद्वार।
बुधवार को अक्षय तृतीया का पर्व पड़ रहा है। यह वही दिन है जिस दिन भगवान विष्णु प्रगट हुए थे। वेद व्यास ने इसी दिन महाभारत और पुराण लिखने शुरू किए। सतयुग और त्रेता का जन्म बैसाख शुक्ल तृतीया को ही हुआ था। दक्षिण में आज के दिन कुबेर पूजा होती है और जैन समाज भगवान आदिनाथ का पारणा पर्व इसी दिन मनाता है। अन्नपूर्णा और परशुराम भी अक्षय तृतीय पर अवतरित हुए।
अक्षय तृतीया को आखा तीज और अखाती तीज के रूप में देश के अनेक भागों में मनाया जाता है। इस दिन मनुष्य जितने पुण्य कर ले, वे अक्षय हैं। किए पाप भी नष्ट नहीं होते। अनन्त से विष्णु इसी दिन प्रगट हुए। इसलिए यह प्रकृति का प्रथम दिन भी है। तृतीया के दिन ही सुदामा और कृष्णा का मिलन हुआ था। ओड़िशा में इसे किसानों के पर्व के रूप में मनाया जाता है और अन्नपूर्णा की पूजा होती है। बंगाल में यह पर्व लक्ष्मी गणेश के पूजन के साथ मनाते हैं। पंजाब इस दिन पशुओं को चारा और पक्षियों को दाना डाला जाता है। पूर्वोत्तर भारत में इस दिन गेहूं, चने, बाजरे आदि से बने सत्तू का प्रयोग पेय के रूप में किया जाता है। इसी दिन ऋषभ देव ने राजपाट त्यागकर अपने 101 पुत्रों को संपदा सौंप दी थी। वे तप करने चले गए और तीर्थंकर आदिनाथ के रूप में प्रसिद्ध हुए। फल मिलने पर उन्होंने गन्ने का रस लेकर तप तोड़ा था, अत: जैन समाज इस दिन पारणा पर्व मानते हुए रस ग्रहण करता है। अक्षय तृतीया के दिन दक्षिण भारत में कुबेर की पूजा होती है। समुद्र स्नान की महत्ता है। वृंदावन में वर्ष में एक बार इसी दिन भगवान बांके बिहारी के विग्रह दर्शन होते हैं। शेष वर्ष में बांके बिहारी वस्त्रों से ढके रहते हैं।
अक्षय तृतीय को स्वयं सिद्ध पर्व माना जाता है। संयोग से इस बार यह पर्व सिद्धि योग और कृतिका नक्षत्र में पड़ रहे हैं। लक्ष्मी नारायण की पूजा का मुहूर्त प्रात: 5.56 बजे से दोपहर 12.20 बजे तक है। यह दिन बिन सुझा, विवाहों और कार्य प्रारंभ का है। इस दिन स्वर्ण की खरीद भी दक्षिण भारत में होती है, जो पूरे देश में होने लगी है। अक्षय तृतीया के दिन यह सृष्टि और प्रकृति बने थे, अत: किसी भी कार्य का शुभारंभ करना शुभ है। अनेक महापुरुषों से जुड़ी अक्षय तृतीया वर्ष का श्रेष्ठतम दिन है।
बुधवार को अक्षय तृतीया का पर्व पड़ रहा है। यह वही दिन है जिस दिन भगवान विष्णु प्रगट हुए थे। वेद व्यास ने इसी दिन महाभारत और पुराण लिखने शुरू किए। सतयुग और त्रेता का जन्म बैसाख शुक्ल तृतीया को ही हुआ था। दक्षिण में आज के दिन कुबेर पूजा होती है और जैन समाज भगवान आदिनाथ का पारणा पर्व इसी दिन मनाता है। अन्नपूर्णा और परशुराम भी अक्षय तृतीय पर अवतरित हुए।
अक्षय तृतीया को आखा तीज और अखाती तीज के रूप में देश के अनेक भागों में मनाया जाता है। इस दिन मनुष्य जितने पुण्य कर ले, वे अक्षय हैं। किए पाप भी नष्ट नहीं होते। अनन्त से विष्णु इसी दिन प्रगट हुए। इसलिए यह प्रकृति का प्रथम दिन भी है। तृतीया के दिन ही सुदामा और कृष्णा का मिलन हुआ था। ओड़िशा में इसे किसानों के पर्व के रूप में मनाया जाता है और अन्नपूर्णा की पूजा होती है। बंगाल में यह पर्व लक्ष्मी गणेश के पूजन के साथ मनाते हैं। पंजाब इस दिन पशुओं को चारा और पक्षियों को दाना डाला जाता है। पूर्वोत्तर भारत में इस दिन गेहूं, चने, बाजरे आदि से बने सत्तू का प्रयोग पेय के रूप में किया जाता है। इसी दिन ऋषभ देव ने राजपाट त्यागकर अपने 101 पुत्रों को संपदा सौंप दी थी। वे तप करने चले गए और तीर्थंकर आदिनाथ के रूप में प्रसिद्ध हुए। फल मिलने पर उन्होंने गन्ने का रस लेकर तप तोड़ा था, अत: जैन समाज इस दिन पारणा पर्व मानते हुए रस ग्रहण करता है। अक्षय तृतीया के दिन दक्षिण भारत में कुबेर की पूजा होती है। समुद्र स्नान की महत्ता है। वृंदावन में वर्ष में एक बार इसी दिन भगवान बांके बिहारी के विग्रह दर्शन होते हैं। शेष वर्ष में बांके बिहारी वस्त्रों से ढके रहते हैं।
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अक्षय तृतीय को स्वयं सिद्ध पर्व माना जाता है। संयोग से इस बार यह पर्व सिद्धि योग और कृतिका नक्षत्र में पड़ रहे हैं। लक्ष्मी नारायण की पूजा का मुहूर्त प्रात: 5.56 बजे से दोपहर 12.20 बजे तक है। यह दिन बिन सुझा, विवाहों और कार्य प्रारंभ का है। इस दिन स्वर्ण की खरीद भी दक्षिण भारत में होती है, जो पूरे देश में होने लगी है। अक्षय तृतीया के दिन यह सृष्टि और प्रकृति बने थे, अत: किसी भी कार्य का शुभारंभ करना शुभ है। अनेक महापुरुषों से जुड़ी अक्षय तृतीया वर्ष का श्रेष्ठतम दिन है।
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