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जल्द फिर से घर-घर चहकेंगी गौरेया
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ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार। विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी गौरैया की चहचहाहट शहरों में फिर से सुनाई देने लगी है। यह सब कुछ संभव हो सका है गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के अथक प्रयासों से। प्राकृतिक आवास खत्म होने के बाद कृत्रिम घोंसले बनाने के बाद दिल्ली, देहरादून और हरिद्वार जैसे स्थानों पर गौरैया की संख्या में दस फीसदी तक बढ़ गई। विवि के पक्षी विशेषज्ञ प्रो. दिनेश भट्ट इन परिणामों से काफी खुश हैं।
जर्मनी के हेंसबर्ग में वर्ष 2006 में पक्षी विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में एक विशेष सत्र गौरैया प्रजाति की विश्वस्तर पर घटती जनसंख्या और उसके संरक्षण पर चर्चा की गई थी। उस दौरान भारत की किसी भी प्रयोगशाला के पास गौरैया की संख्या का कोई भी आंकड़ा उपलब्ध नहीं था। सम्मेलन से वापस आने के बाद वर्ष 2007 में प्रोफेसर दिनेश भट्ट ने गौरैया की जनसंख्या के आंकड़े जुटाने का कार्य शुरू किया। शोध में दिल्ली, सहारनपुर, हरिद्वार, देहरादून, गढ़मुक्तेश्वर, नजीबाबाद, कोटद्वार, रुड़की आदि शहरों में गौरैया की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत तक की कमी आने की बात सामने आई थी। जबकि पर्वतीय क्षेत्र के छोटे नगरों श्रीनगर, गोपेश्वर, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, गौरीकुंड आदि में गौरैया की संख्या में मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा कम कमी पाई गई थी। घटती संख्या के कारणों की गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रो. दिनेश भट्ट के नेतृत्व में जंतु एवं पर्यावरण विभाग की पक्षी विविधता एवं जीव संवाद लैब में पता लगाया गया। जिसके बाद उत्तराखंड के सभी जनपदों और उत्तर प्रदेश के कुछ जनपदों में गौरैया के लकड़ी से बने पांच हजार से अधिक घोंसले बनाकर रखे गए। वर्ष 2013 तक तो गौरैया की संख्या में कोई वृद्धि दर्ज नहीं की गई, लेकिन वर्ष 2014 के बाद गौरैया की संख्या में लगभग 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि वर्ष 2018 में दस प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
आधुनिकता बन रही अभिशाप
गौरैया बॉयो इंजेक्टर का काम करती है। साथ ही ये एक प्रकार की घरेलू चिड़िया होती है, लेकिन इस पर आधुनिकता का मार पड़ी। शोध में पाया गया कि आधुनिक आर्किटेक्चर से बने घरों में गौरैया के लिए घोंसला बनाने और घर के अंदर प्रवेश करने के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा गया है। जिस कारण गौरैया ने जहां-तहां घोंसले बनाकर अंडे देने शुरू किए तो वह या तो जमीन पर गिरकर फूट गए या सर्वआहारी पक्षियों का शिकार बन गए। अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में गौरैया की एक सीमित संख्या प्रजनन करती पाई गई। जहां इस परिवेश में भी गौरैया के चूजों की मौत होती देखी गई। दरअसल गौरैया कीट खाती है और अपने चूजों को भी कीट ही खिलाती है, लेकिन खेतों और आम के बगीचों में अधिक कीटनाशक उपयोग के कारण कीट भी जहरीले हो गए हैं। शोध में सामने आया कि इन कीट को खाने के पांच से सात दिन में चूजे मर रहे हैं।
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शोध टीम में ये रहे शामिल
उत्तराखंड संस्कृत विवि के डा. दिनेश सेठी, गुरुकुल कांगड़ी विवि के डा. अमर सिंह, रॉबिन, आशीष, पारुल शोध टीम में शामिल रहे, जबकि डा. विकास सैनी की थीसिस गौरैया की समस्या को लेकर ही थी।
पर्यावरण विभाग की पक्षी विविधता एवं जीव संवाद लैब देश की एकमात्र लैब है जो पक्षी संवाद पर कार्य कर रही है। लकड़ी का बनाया घोंसला रखने से दस प्रतिशत तक गौरैया की संख्या बढ़ी है।
- प्रो. दिनेश भट्ट, अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैैज्ञानिक, गुरुकुल कांगड़ी विवि
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जर्मनी के हेंसबर्ग में वर्ष 2006 में पक्षी विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में एक विशेष सत्र गौरैया प्रजाति की विश्वस्तर पर घटती जनसंख्या और उसके संरक्षण पर चर्चा की गई थी। उस दौरान भारत की किसी भी प्रयोगशाला के पास गौरैया की संख्या का कोई भी आंकड़ा उपलब्ध नहीं था। सम्मेलन से वापस आने के बाद वर्ष 2007 में प्रोफेसर दिनेश भट्ट ने गौरैया की जनसंख्या के आंकड़े जुटाने का कार्य शुरू किया। शोध में दिल्ली, सहारनपुर, हरिद्वार, देहरादून, गढ़मुक्तेश्वर, नजीबाबाद, कोटद्वार, रुड़की आदि शहरों में गौरैया की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत तक की कमी आने की बात सामने आई थी। जबकि पर्वतीय क्षेत्र के छोटे नगरों श्रीनगर, गोपेश्वर, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, गौरीकुंड आदि में गौरैया की संख्या में मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा कम कमी पाई गई थी। घटती संख्या के कारणों की गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रो. दिनेश भट्ट के नेतृत्व में जंतु एवं पर्यावरण विभाग की पक्षी विविधता एवं जीव संवाद लैब में पता लगाया गया। जिसके बाद उत्तराखंड के सभी जनपदों और उत्तर प्रदेश के कुछ जनपदों में गौरैया के लकड़ी से बने पांच हजार से अधिक घोंसले बनाकर रखे गए। वर्ष 2013 तक तो गौरैया की संख्या में कोई वृद्धि दर्ज नहीं की गई, लेकिन वर्ष 2014 के बाद गौरैया की संख्या में लगभग 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि वर्ष 2018 में दस प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
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आधुनिकता बन रही अभिशाप
गौरैया बॉयो इंजेक्टर का काम करती है। साथ ही ये एक प्रकार की घरेलू चिड़िया होती है, लेकिन इस पर आधुनिकता का मार पड़ी। शोध में पाया गया कि आधुनिक आर्किटेक्चर से बने घरों में गौरैया के लिए घोंसला बनाने और घर के अंदर प्रवेश करने के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा गया है। जिस कारण गौरैया ने जहां-तहां घोंसले बनाकर अंडे देने शुरू किए तो वह या तो जमीन पर गिरकर फूट गए या सर्वआहारी पक्षियों का शिकार बन गए। अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में गौरैया की एक सीमित संख्या प्रजनन करती पाई गई। जहां इस परिवेश में भी गौरैया के चूजों की मौत होती देखी गई। दरअसल गौरैया कीट खाती है और अपने चूजों को भी कीट ही खिलाती है, लेकिन खेतों और आम के बगीचों में अधिक कीटनाशक उपयोग के कारण कीट भी जहरीले हो गए हैं। शोध में सामने आया कि इन कीट को खाने के पांच से सात दिन में चूजे मर रहे हैं।
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शोध टीम में ये रहे शामिल
उत्तराखंड संस्कृत विवि के डा. दिनेश सेठी, गुरुकुल कांगड़ी विवि के डा. अमर सिंह, रॉबिन, आशीष, पारुल शोध टीम में शामिल रहे, जबकि डा. विकास सैनी की थीसिस गौरैया की समस्या को लेकर ही थी।
पर्यावरण विभाग की पक्षी विविधता एवं जीव संवाद लैब देश की एकमात्र लैब है जो पक्षी संवाद पर कार्य कर रही है। लकड़ी का बनाया घोंसला रखने से दस प्रतिशत तक गौरैया की संख्या बढ़ी है।
- प्रो. दिनेश भट्ट, अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैैज्ञानिक, गुरुकुल कांगड़ी विवि