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गौ रक्षा के बलिदानी मुक्खा सिंह चौहान के याद में हो जाती आंखें नम
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ब्यूरो/अमर उजाला, पथरी
कटारपुर गांव के गोभक्त मुक्खा सिंह चौहान को करीब नौ दशक पहले आठ फरवरी के दिन गायों को बंधनमुक्त करने के आरोप में पहले काला पानी और फिर फांसी की सजा सुनाई थी। मुक्खा सिंह के बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में हर साल उनको याद किया जाता है।
गांव कटारपुर के लिए आठ फरवरी का दिन काफी महत्वपूर्ण है। इस गांव में अंग्रेजों के शासन काल के दौरान एक अंग्रेज अधिकारी ने सितंबर 1918 को दूसरे समुदाय के त्योहार पर गायों को मारने का फरमान जारी कर दिया था। जब इसकी जानकारी गांव वालों को लगी तो उन्होंने गोरक्षा की ठानी। इनमें गांव के चैनसुख का बेटा मुक्खा सिंह चौहान भी शामिल था। बताया जाता है कि अंग्रेज पुलिस अधिकारी के आदेश पर पांच गायों को पेड़ के नीचे मारने के लिए बांध दिया था। इससे पहले गायों की हत्या होती मुक्खा सिंह चौहान के नेतृत्व में गांव वालों ने पेड़ से बंधी सभी गायों को आजाद कर दिया। गांव वालों की इस हिमाकत से नाराज अंग्रेज अधिकारी ने घटना में शामिल गांव के 135 लोगों को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया। अगस्त 1919 में मुक्खा सिंह चौहान व बाकी लोगों को दस साल की काला पानी की सजा सुनाई गई। आठ फरवरी 1920 को अंग्रेजों ने मुक्खा सिंह चौहान को फांसी दे दी। बाद में देश आजाद हुआ और ग्रामीणों ने उसी पेड़ के नीचे जहां अंग्रेज अधिकारी ने पांच गायों को मारने के लिए बांधा थाख् वहां मुक्खा सिंह चौहान की याद में गोरक्षक स्मारक का निर्माण कराया। इस जगह पर हर साल आठ फरवरी को कार्यक्रम को आयोजन किया जाता है। गांव के श्याम सिंह आर्य, सचिन चौहान, सुदेश चौहान, राजेंद्र सिंह आदि ग्रामीणों का कहना है कि मुक्खा सिंह चौहान की याद में आठ फरवरी को गोरक्षा बलिदान दिवस मनाया जाता है।
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कटारपुर गांव के गोभक्त मुक्खा सिंह चौहान को करीब नौ दशक पहले आठ फरवरी के दिन गायों को बंधनमुक्त करने के आरोप में पहले काला पानी और फिर फांसी की सजा सुनाई थी। मुक्खा सिंह के बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में हर साल उनको याद किया जाता है।
गांव कटारपुर के लिए आठ फरवरी का दिन काफी महत्वपूर्ण है। इस गांव में अंग्रेजों के शासन काल के दौरान एक अंग्रेज अधिकारी ने सितंबर 1918 को दूसरे समुदाय के त्योहार पर गायों को मारने का फरमान जारी कर दिया था। जब इसकी जानकारी गांव वालों को लगी तो उन्होंने गोरक्षा की ठानी। इनमें गांव के चैनसुख का बेटा मुक्खा सिंह चौहान भी शामिल था। बताया जाता है कि अंग्रेज पुलिस अधिकारी के आदेश पर पांच गायों को पेड़ के नीचे मारने के लिए बांध दिया था। इससे पहले गायों की हत्या होती मुक्खा सिंह चौहान के नेतृत्व में गांव वालों ने पेड़ से बंधी सभी गायों को आजाद कर दिया। गांव वालों की इस हिमाकत से नाराज अंग्रेज अधिकारी ने घटना में शामिल गांव के 135 लोगों को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया। अगस्त 1919 में मुक्खा सिंह चौहान व बाकी लोगों को दस साल की काला पानी की सजा सुनाई गई। आठ फरवरी 1920 को अंग्रेजों ने मुक्खा सिंह चौहान को फांसी दे दी। बाद में देश आजाद हुआ और ग्रामीणों ने उसी पेड़ के नीचे जहां अंग्रेज अधिकारी ने पांच गायों को मारने के लिए बांधा थाख् वहां मुक्खा सिंह चौहान की याद में गोरक्षक स्मारक का निर्माण कराया। इस जगह पर हर साल आठ फरवरी को कार्यक्रम को आयोजन किया जाता है। गांव के श्याम सिंह आर्य, सचिन चौहान, सुदेश चौहान, राजेंद्र सिंह आदि ग्रामीणों का कहना है कि मुक्खा सिंह चौहान की याद में आठ फरवरी को गोरक्षा बलिदान दिवस मनाया जाता है।
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