{"_id":"714f6fc1ece900ca8ea54b0d2335b227","slug":"disaster-also-destroyed-gharats","type":"story","status":"publish","title_hn":"...तब गांवों के पास थे पर्सनल 'पावर स्टेशन'","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
...तब गांवों के पास थे पर्सनल 'पावर स्टेशन'
अमर उजाला, सुधाकर भट्ट, गुप्तकाशी
Updated Fri, 30 Aug 2013 11:57 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
16-17 जून को उत्तराखंड में नदियों ने कई गांवों की नींव ही नहीं हिलाई बल्कि गांवों की रोशनी भी छीनी। केदार घाटी के अंतिम छोर के गांव गोंदार भी इसका गवाह है।
विज्ञापन
गांव के पांच घराट मधु गंगा अपने साथ बहा कर ले गई। इससे पहले गांव इन घराटों से पैदा होने वाली बिजली से रोशन था।
पढें...क्या कर रहे हैं केदारनाथ में 100 लोग?
विज्ञापन
सरकार को नहीं याद
हालांकि गांव को गुप्तकाशी से भी बिजली मिल जाती थी पर बरसात के मौसम में घराटों से मिलने वाली बिजली ही थी जिससे पूरा गांव रात में चमचमाता था।
फिलहाल जल विद्युत परियोजनाओं से छह हजार करोड़ कमाने की फिक्र में पड़ी सरकार को शायद गांवों की अपनी पन बिजली की याद नहीं आई है।
पढें...जल पाएगें केदारनाथ में क्या फिर से दीप?
विज्ञापन
घराटों से रोशन करते थे घर
पहाड़ के गांवों में घराट कुछ समय पहले तक केवल अनाज पीसने के काम ही आया करते थे। गोंदार का भी यही हाल था। पर ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों में साल भर पानी रहता है लिहाजा इन घराटों का उपयोग मिनी टरबाइन की तरह बिजली बनाने में भी होने लगा था।
गोंदार में ऐसे पांच घराट थे जिनसे करीब सात किलोवाट तक की बिजली पैदा हो जाती थी। करीब पांच सौ मीटर की तार खींचने के बाद गांव को करीब पांच किलोवाट की बिजली मिल जाया करनी थी।
रोशन होता था गांव
इस बिजली की बदौलत गांव हर रात रोशन रहता था। लोगों के मोबाइल फोन चार्ज होते थे और टीवी चलते थे।
गांव के प्रधान भगत सिंह पंवार के मुताबिक घराट से बिजली की गांव को इतनी आदत पड़ चुकी थी कि इस बात का अहसास तक नहीं होता था कि गांव को गुप्तकाशी से आ रही बिजली की लाइन से भी बिजली मिलती है।
बिजली तो आती-जाती है
पर 16-17 जून को नदी में आई बाढ़ से पांचों घराट बह गए। हाल यह हुआ कि आपदा के एक माह बाद तक भी गांव पूरी तरह से अंधेरे में डूबा रहा। एक माह बाद बिजली आई भी तो कुछ घंटों के लिए ही। अब भी यही हाल है। बिजली बस कुछ घंटों की ही मेहमान है।
मुसीबत यह है कि आपदा के ढाई माह बाद भी गोंदार के लोगों को किसी ने यह नहीं पूछा कि चलो तुम्हे घराट ही बनाकर दे दें। गांव के विस्थापन की बात हो रही है। राशन दिया जा रहा है।
खामोश गांव
गांव के लोगों को राहत में सोलर लालटेन भी दी गई पर घराट नए सिरे से बनाने की बात किसी ने नहीं की। यह हाल सिर्फ गोंदार का ही नही है। केदारघाटी के चौमासी, कोटमा जैसे गांव भी घराट के नए अवतार से वाकिफ हैं।
जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर सरकार अपनी संजीदगी को कई बार जता चुकी है पर गांवों की अपनी विद्युत परियोजनाओं को लेकर अभी खामोशी है।