{"_id":"5af71dfc4f1c1bce408b4d10","slug":"swanala-s-hospital-is-being-trusted-by-a-pharmacist","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक फार्मेसिस्ट के भरोसे चल रहा है स्वांला का अस्पताल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
एक फार्मेसिस्ट के भरोसे चल रहा है स्वांला का अस्पताल
अमर उजाला ब्यूराे चंपावत।
Updated Sat, 12 May 2018 10:31 PM IST
विज्ञापन
स्वांला में सफेद हाथी बना राजकीय एलोपैथिक चिकित्सालय।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
स्वांला स्थित राजकीय एलोपैथिक अस्पताल एक फार्मेसिस्ट के भरोसे चल रहा है। अस्पताल में डाक्टर न होने से यहां उपचार के लिए आने वाले मरीजों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में पर्याप्त दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। जिस कारण ग्रामीणों को जिला अस्पताल की दौड़ लगानी पड़ रही है।
ग्राम प्रधान ईश्वरी दत्त भट्ट, जगदीश भट्ट, तुलसी दत्त, गोविंद बल्लभ भट्ट आदि ग्रामीणों का कहना है कि नाम से तो यह अस्पताल सभी सुविधा युक्त व दवाओं से परिपूर्ण लगता है। मगर यहां न तो दवा ही मिलती है और न ही कोई मरीजों को देखने वाला है। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, दूसरी ओर सरकारी अस्पताल में न तो दवा ही उपलब्ध है न ही कोई दवा देने वाला डाक्टर। बीते दिनों तीन साल की उल्टी दस्त से पीड़ित मासूम को उल्टी दस्त की दवा अथवा ओआरएस तक नहीं मिल पाई। उनका कहना है कि स्वांला का सरकारी अस्पताल कभी मुख्यालय के अस्पताल के बाद दूसरे नंबर का अस्पताल हुआ करता था। जहां अमोड़ी, बेलखेत, स्वांला, बडोली, क्वारसिंग, लड़ाबोरा, चल्थी आदि के लोग इलाज के लिए आते थे। लेकिन अब यह शोपीस बन गया है।
कोट
स्वांला एलोपैथिक अस्पताल में एक सप्ताह पूर्व संविदा डाक्टर की तैनाती की जा चुकी है। जो कार्यभार ग्रहण कर ज्वाइनिंग लीव में गए हैं। जल्द ही अस्पताल की व्यवस्थाएं पटरी पर आ जाएंगी।
विज्ञापन
डॉ.एमएस बोरा, सीएमओ चंपावत।
विज्ञापन
ग्राम प्रधान ईश्वरी दत्त भट्ट, जगदीश भट्ट, तुलसी दत्त, गोविंद बल्लभ भट्ट आदि ग्रामीणों का कहना है कि नाम से तो यह अस्पताल सभी सुविधा युक्त व दवाओं से परिपूर्ण लगता है। मगर यहां न तो दवा ही मिलती है और न ही कोई मरीजों को देखने वाला है। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, दूसरी ओर सरकारी अस्पताल में न तो दवा ही उपलब्ध है न ही कोई दवा देने वाला डाक्टर। बीते दिनों तीन साल की उल्टी दस्त से पीड़ित मासूम को उल्टी दस्त की दवा अथवा ओआरएस तक नहीं मिल पाई। उनका कहना है कि स्वांला का सरकारी अस्पताल कभी मुख्यालय के अस्पताल के बाद दूसरे नंबर का अस्पताल हुआ करता था। जहां अमोड़ी, बेलखेत, स्वांला, बडोली, क्वारसिंग, लड़ाबोरा, चल्थी आदि के लोग इलाज के लिए आते थे। लेकिन अब यह शोपीस बन गया है।
विज्ञापन
कोट
स्वांला एलोपैथिक अस्पताल में एक सप्ताह पूर्व संविदा डाक्टर की तैनाती की जा चुकी है। जो कार्यभार ग्रहण कर ज्वाइनिंग लीव में गए हैं। जल्द ही अस्पताल की व्यवस्थाएं पटरी पर आ जाएंगी।
विज्ञापन
डॉ.एमएस बोरा, सीएमओ चंपावत।