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Champawat News: किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित कर रहे वैज्ञानिक
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सीमांत बसकुनी गांव में गेहूं की बुआई का प्रदर्शन कराते कार्यक्रम सहायक फकीर चंद।
- फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। जिले के लोहाघाट सुंई स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक सोशल मीडिया के माध्यम से किसानों से सीधा संवाद कर रहे हैं। केंद्र प्रभारी डॉ. अमरीश सिरोही के नेतृत्व में सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को खेत से जोड़ने के साथ ही उन्हें जैविक, प्राकृतिक खेती के साथ एकीकृत खेती की ओर प्रेरित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि वैज्ञानिकों की टीम ने अपना केवीके लोहाघाट नाम से व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया है जिसमें वैज्ञानिकों के अलावा प्रगतिशील किसान अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। केंद्र प्रभारी के अनुसार पढ़े-लिखे बेरोजगार अपना समय व्यर्थ न गवाएं, यदि वैज्ञानिक तौर तरीकों से खेती करते हैं तो उनके लिए सम्मानजनक ढंग से जीवन यापन करने की पर्याप्त संभावनाएं एवं अवसर हैं। केंद्र प्रभारी ने बताया कि सोशल मीडिया के माध्यम से अब वैज्ञानिकों का किसानों से सीधा संवाद होने से उनका खेतों के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. सचिन पंत, डॉ. भूपेंद्र खड़ायत, डॉ. पूजा पांडेय, डॉ. रजनी पंत, कार्यक्रम सहायक फकीर चंद एवं गायत्री देवी के अनुसार किसानों से किया जा रहा सीधा संवाद काफी प्रभावी होता जा रहा है। क्षेत्र के प्रगतिशील किसानों के अलावा भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष नवीन करायत ने इसे सराहनीय पहल बताया है।
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बसकुनी गांव में गेहूं की बुआई का प्रदर्शन किया
चंपावत। कृषि विज्ञान केंद्र के कार्यक्रम सहायक फकीर चंद ने नेपाल सीमा से लगे बसकुनी गांव में खेतों में गेहूं की बुआई का लाइन शो का प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि लाइन में बीज डालने से जहां 25 फीसदी बीज कम लगता है वहीं 95 फीसदी बीज अंकुरित भी होता है। एक पौध की दूसरे पौध के बीच दूरी होने से पौध को धूप, हवा मिलने, गुड़ाई करने में आसानी होती है। इससे पौधों को नमी भी मिलती रहती है जबकि बीज छिड़ककर बोने से 25 फीसदी बीज बाहर रह जाता है, जिसे पक्षी चुग जाते हैं। संवाद
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उन्होंने बताया कि वैज्ञानिकों की टीम ने अपना केवीके लोहाघाट नाम से व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया है जिसमें वैज्ञानिकों के अलावा प्रगतिशील किसान अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। केंद्र प्रभारी के अनुसार पढ़े-लिखे बेरोजगार अपना समय व्यर्थ न गवाएं, यदि वैज्ञानिक तौर तरीकों से खेती करते हैं तो उनके लिए सम्मानजनक ढंग से जीवन यापन करने की पर्याप्त संभावनाएं एवं अवसर हैं। केंद्र प्रभारी ने बताया कि सोशल मीडिया के माध्यम से अब वैज्ञानिकों का किसानों से सीधा संवाद होने से उनका खेतों के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है।
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केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. सचिन पंत, डॉ. भूपेंद्र खड़ायत, डॉ. पूजा पांडेय, डॉ. रजनी पंत, कार्यक्रम सहायक फकीर चंद एवं गायत्री देवी के अनुसार किसानों से किया जा रहा सीधा संवाद काफी प्रभावी होता जा रहा है। क्षेत्र के प्रगतिशील किसानों के अलावा भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष नवीन करायत ने इसे सराहनीय पहल बताया है।
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बसकुनी गांव में गेहूं की बुआई का प्रदर्शन किया
चंपावत। कृषि विज्ञान केंद्र के कार्यक्रम सहायक फकीर चंद ने नेपाल सीमा से लगे बसकुनी गांव में खेतों में गेहूं की बुआई का लाइन शो का प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि लाइन में बीज डालने से जहां 25 फीसदी बीज कम लगता है वहीं 95 फीसदी बीज अंकुरित भी होता है। एक पौध की दूसरे पौध के बीच दूरी होने से पौध को धूप, हवा मिलने, गुड़ाई करने में आसानी होती है। इससे पौधों को नमी भी मिलती रहती है जबकि बीज छिड़ककर बोने से 25 फीसदी बीज बाहर रह जाता है, जिसे पक्षी चुग जाते हैं। संवाद

डॉ. अमरेश सिरोही, केवीके प्रभारी।- फोटो : CHAMPAWAT