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गर्भ से गाय के मृत बच्चे को निकाला, दुधारू गाय की जान भी बचाई
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पशु चिकित्सक रोहित नौगाई।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। गाय के गर्भ में 15 दिन का मरा बच्चा और बच्चेदानी का मुंह बंद। ऐसी स्थिति में चंपावत ब्लॉक के नरसिंहडांडा पशु अस्पताल के डॉक्टर रोहित नौगाई से संपर्क किया गया। पशु प्रसूति एवं मादा रोग विशेषज्ञ डॉ. रोहित नौगाई की ढाई घंटे की मेहनत रंग लाई और ऑपरेशन करने के बाद मरे हुए बच्चे को सुरक्षित निकाला गया। यह चंपावत जिले का पहला सफल केस है।
गोशनी गांव निवासी सुनील ओली की रोजाना 15 लीटर दूध देने वाली गाय की हालात बेहद खराब थी। पाटी ब्लॉक में एक भी पशु चिकित्सक नहीं होने से सुनील को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। अपनी परेशानी जब सुनील में डॉ. नौगाई को बताई तो उन्होंने सड़क विहीन गांव से अस्पताल तक पहुंचने के खतरे को देखते हुए पशुपालक के घर में ही ऑपरेशन को करने का निर्णय लिया। गाय को बेहोश करने के बाद ढाई घंटे में सफल ऑपरेशन हो गया। डॉ. नौगाई ने बताया कि ऑपरेशन में चुनौती यह भी थी कि प्रसव की अवधि से 30 दिन अधिक हो गए थे। सड़ने के अलावा बच्चा बड़ा हो चुका था और संक्रमण से गर्भवती गाय की जिंदगी को भी खतरा था। गाय स्वामी ओली का कहना है कि अस्पताल की दस रुपये की पर्ची के अलावा जो दवाएं अस्पताल में नहीं थी, उन्हें मंगाया गया। इन सब में महज 2200 रुपये खर्च हुए। ऑपरेशन की खास बात यह रही कि एक हफ्ते में स्वस्थ होने के बाद 15 दिन के भीतर गाय दूध भी देने लगेगी। साथ ही चार महीने में फिर से गाभिन भी हो सकेगी। संवाद
फोटो 04 सीपीटी (सिंगल)
पाटी ब्लॉक में एक भी डॉक्टर नहीं
चंपावत। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती बगैर पशुपालन अधूरी है, लेकिन जिले में पशुपालन विभाग और पशुपालक दोनों के हाल अच्छे नहीं है। पशुओं की देखरेख के लिए न कायदे की व्यवस्था है और नहीं मजबूत विभागीय ढांचा। 15 अस्पतालों में से चार में पशु डॉक्टर और 12 पशु प्रसार केंद्र में पशुधन प्रसार अधिकारी नहीं है। पाटी ब्लॉक के एक भी अस्पताल में डॉक्टर नहीं है। ऐसे में इन ग्रामीणों को अपने मवेशियों के इलाज के लिए 45 किमी दूर तक जाना पड़ रहा है।
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जिले की 2.65 लाख की आबादी में से 1.34 लाख पशुपालक हैं। 1.07 लाख गायों सहित करीब 2.43 लाख पशु हैं। भैस, बकरी, सुअर, खरगोश, मुर्गी, घोड़े, खच्चर को भी यहां बहुतायत में पाला जाता है। एक दुधारू पशु रोजाना औसतन दो लीटर दूध दे रहा है। कई जगह घोड़े और खच्चर आवाजाही और माल ढोने के रूप में उपयोग में आते है, लेकिन अस्पतालों की कमी से पशुपालकों की दिक्कतें कम नहीं हो रही है।
इन चार पशु अस्पतालों में नहीं है डॉक्टर
खेतीखान, पाटी, चल्थी और अंगोरा शशक प्रजनन केंद्र।
इन केंद्रों में नहीं है पशुधन प्रसार अधिकारी
मंच, तामली, सूखीढांग, ऊचौलीगोठ, खतेड़ा, बसेड़ी, पुलहिंडोला, रैगांव, देवीधुरा, जोश्यूड़ा, भिंगराड़ा और चौड़ामेहता।
जिले के पशु अस्पताल में दो डॉक्टर अध्ययन अवकाश पर हैं, जबकि दो अन्य अस्पतालों में डॉक्टर के पद खाली हैं। वहीं पशुधन प्रसार अधिकारियों की कमी दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों की व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। फिर भी शिविर लगाकर पशुओं को इलाज देने की व्यवस्था का प्रयास किया गया है।
- डॉ. बीएस जंगपांगी, सीवीओ, चंपावत।
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गोशनी गांव निवासी सुनील ओली की रोजाना 15 लीटर दूध देने वाली गाय की हालात बेहद खराब थी। पाटी ब्लॉक में एक भी पशु चिकित्सक नहीं होने से सुनील को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। अपनी परेशानी जब सुनील में डॉ. नौगाई को बताई तो उन्होंने सड़क विहीन गांव से अस्पताल तक पहुंचने के खतरे को देखते हुए पशुपालक के घर में ही ऑपरेशन को करने का निर्णय लिया। गाय को बेहोश करने के बाद ढाई घंटे में सफल ऑपरेशन हो गया। डॉ. नौगाई ने बताया कि ऑपरेशन में चुनौती यह भी थी कि प्रसव की अवधि से 30 दिन अधिक हो गए थे। सड़ने के अलावा बच्चा बड़ा हो चुका था और संक्रमण से गर्भवती गाय की जिंदगी को भी खतरा था। गाय स्वामी ओली का कहना है कि अस्पताल की दस रुपये की पर्ची के अलावा जो दवाएं अस्पताल में नहीं थी, उन्हें मंगाया गया। इन सब में महज 2200 रुपये खर्च हुए। ऑपरेशन की खास बात यह रही कि एक हफ्ते में स्वस्थ होने के बाद 15 दिन के भीतर गाय दूध भी देने लगेगी। साथ ही चार महीने में फिर से गाभिन भी हो सकेगी। संवाद
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फोटो 04 सीपीटी (सिंगल)
पाटी ब्लॉक में एक भी डॉक्टर नहीं
चंपावत। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती बगैर पशुपालन अधूरी है, लेकिन जिले में पशुपालन विभाग और पशुपालक दोनों के हाल अच्छे नहीं है। पशुओं की देखरेख के लिए न कायदे की व्यवस्था है और नहीं मजबूत विभागीय ढांचा। 15 अस्पतालों में से चार में पशु डॉक्टर और 12 पशु प्रसार केंद्र में पशुधन प्रसार अधिकारी नहीं है। पाटी ब्लॉक के एक भी अस्पताल में डॉक्टर नहीं है। ऐसे में इन ग्रामीणों को अपने मवेशियों के इलाज के लिए 45 किमी दूर तक जाना पड़ रहा है।
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जिले की 2.65 लाख की आबादी में से 1.34 लाख पशुपालक हैं। 1.07 लाख गायों सहित करीब 2.43 लाख पशु हैं। भैस, बकरी, सुअर, खरगोश, मुर्गी, घोड़े, खच्चर को भी यहां बहुतायत में पाला जाता है। एक दुधारू पशु रोजाना औसतन दो लीटर दूध दे रहा है। कई जगह घोड़े और खच्चर आवाजाही और माल ढोने के रूप में उपयोग में आते है, लेकिन अस्पतालों की कमी से पशुपालकों की दिक्कतें कम नहीं हो रही है।
इन चार पशु अस्पतालों में नहीं है डॉक्टर
खेतीखान, पाटी, चल्थी और अंगोरा शशक प्रजनन केंद्र।
इन केंद्रों में नहीं है पशुधन प्रसार अधिकारी
मंच, तामली, सूखीढांग, ऊचौलीगोठ, खतेड़ा, बसेड़ी, पुलहिंडोला, रैगांव, देवीधुरा, जोश्यूड़ा, भिंगराड़ा और चौड़ामेहता।
जिले के पशु अस्पताल में दो डॉक्टर अध्ययन अवकाश पर हैं, जबकि दो अन्य अस्पतालों में डॉक्टर के पद खाली हैं। वहीं पशुधन प्रसार अधिकारियों की कमी दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों की व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। फिर भी शिविर लगाकर पशुओं को इलाज देने की व्यवस्था का प्रयास किया गया है।
- डॉ. बीएस जंगपांगी, सीवीओ, चंपावत।