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टॉप प्राथमिकता बढ़ाएगा आलू की पैदावार!
अमर उजाला ब्यूराे चंपावत।
Updated Wed, 04 Apr 2018 10:45 PM IST
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लोहाघाट में लहलहाती आलू की खेती।
- फोटो : अमर उजाला
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चंपावत। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी में बंगलूरू में टॉप को अपनी शीर्ष प्राथमिकताओं में बताया। टॉप (टीओपी) यानी टोमैटो (टमाटर), ओनियन (प्याज) व पोटेटो (आलू) की खेती के जरिये किसानों की खुशहाली को बढ़ाने का इरादा जताया गया। मगर चंपावत जिले में इन तीनों सब्जियों की पैदावार कर पाना काश्तकारों के लिए मुसीबत का सबब बन रहा है। खासकर आलू के लिए प्रसिद्ध रहे चंपावत जिले में पिछले एक दशक में आलू की खेती के क्षेत्रफल में 52 प्रतिशत और उत्पादन में 69 प्रतिशत की कमी आ गई है।
चंपावत, खेतीखान, लोहाघाट आदि इलाके आलू की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं। मैदान की तरह मीठापन न होने की वजह से पहाड़ के आलू की मैदान में भी खूब मांग होती है और दाम भी अच्छा मिलता है। मगर इसके बावजूद यहां आलू की खेती लगातार कम हो रही है। 2007 में जिले में 2314 हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती होती थी। जो पिछले साल तक घटकर 1105 हेक्टेयर हो गई। इस अवधि में क्षेत्रफल की तरह ही उत्पादन में भी 69.78 प्रतिशत गिरावट हो गई है। 2007 में आलू का उत्पादन 38644 मीट्रिक टन होता था। पिछले साल तक यह घटकर मात्र 11678 मीट्रिक टन रह गया है।
वर्ष आलू की खेती एरिया (हेक्टेयर) उत्पादन (एमटी)
2007 2314 38644
2017 1105 11678
जंगली जानवर हैं सबसे बड़ा सिरदर्द
भारतीय किसान यूनियन का कहना है कि आलू की खेती के लिए अनुकूल हालात के बावजूद इसमें लगातार कमी हो रही है। यूनियन जिलाध्यक्ष नवीन करायत का कहना है कि पहाड़ में जंगली जानवर खड़ी फसल तबाह कर किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं। इससे निजात दिलाने के लिए कारगर कार्य नीति जरूरी है। इसके अलावा सिंचाई के साधन बढ़ाने के साथ वक्त पर कम ब्याज दर पर कर्ज की व्यवस्था करनी होगी।
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कोट
चंपावत का आलू जैविक श्रेणी का है। जो सेहत मंद होने के साथ ही स्वाद में भी बेहतर है। मांग होने के चलते यहां के आलू के लिए बाजार की भी कमी नहीं है। लेकिन जंगली जानवरों के चलते आलू की खेती करना किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है। लिहाजा इसकी खेती कम होती जा रही है।
एनके आर्या, जिला उद्यान अधिकारी, चंपावत।
नहीं होती प्याज की व्यापारिक खेती
जिले में प्याज की व्यापारिक खेती नहीं होती है। उद्यान विभाग का कहना है कि जिले में ज्यादातर काश्तकार सिर्फ अपने उपयोग के लिए प्याज की खेती करते हैं। 2016-17 में महज 75 हेक्टेयर क्षेत्र में प्याज की खेती हुई। जिसमें 585 एमटी उत्पादन हुआ। अलबत्ता टमाटर की खेती भरपूर होती है। पिछले साल चंपावत में 601 हेक्टेयर में टमाटर लगाया गया, जिसमें 6235 एमटी पैदावार हुई।
चंपावत, खेतीखान, लोहाघाट आदि इलाके आलू की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं। मैदान की तरह मीठापन न होने की वजह से पहाड़ के आलू की मैदान में भी खूब मांग होती है और दाम भी अच्छा मिलता है। मगर इसके बावजूद यहां आलू की खेती लगातार कम हो रही है। 2007 में जिले में 2314 हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती होती थी। जो पिछले साल तक घटकर 1105 हेक्टेयर हो गई। इस अवधि में क्षेत्रफल की तरह ही उत्पादन में भी 69.78 प्रतिशत गिरावट हो गई है। 2007 में आलू का उत्पादन 38644 मीट्रिक टन होता था। पिछले साल तक यह घटकर मात्र 11678 मीट्रिक टन रह गया है।
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वर्ष आलू की खेती एरिया (हेक्टेयर) उत्पादन (एमटी)
2007 2314 38644
2017 1105 11678
जंगली जानवर हैं सबसे बड़ा सिरदर्द
भारतीय किसान यूनियन का कहना है कि आलू की खेती के लिए अनुकूल हालात के बावजूद इसमें लगातार कमी हो रही है। यूनियन जिलाध्यक्ष नवीन करायत का कहना है कि पहाड़ में जंगली जानवर खड़ी फसल तबाह कर किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं। इससे निजात दिलाने के लिए कारगर कार्य नीति जरूरी है। इसके अलावा सिंचाई के साधन बढ़ाने के साथ वक्त पर कम ब्याज दर पर कर्ज की व्यवस्था करनी होगी।
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कोट
चंपावत का आलू जैविक श्रेणी का है। जो सेहत मंद होने के साथ ही स्वाद में भी बेहतर है। मांग होने के चलते यहां के आलू के लिए बाजार की भी कमी नहीं है। लेकिन जंगली जानवरों के चलते आलू की खेती करना किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है। लिहाजा इसकी खेती कम होती जा रही है।
एनके आर्या, जिला उद्यान अधिकारी, चंपावत।
नहीं होती प्याज की व्यापारिक खेती
जिले में प्याज की व्यापारिक खेती नहीं होती है। उद्यान विभाग का कहना है कि जिले में ज्यादातर काश्तकार सिर्फ अपने उपयोग के लिए प्याज की खेती करते हैं। 2016-17 में महज 75 हेक्टेयर क्षेत्र में प्याज की खेती हुई। जिसमें 585 एमटी उत्पादन हुआ। अलबत्ता टमाटर की खेती भरपूर होती है। पिछले साल चंपावत में 601 हेक्टेयर में टमाटर लगाया गया, जिसमें 6235 एमटी पैदावार हुई।