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विडंबना:गांव से चुनते हैं सांसद, प्रधान के लिए छह किमी दूर देते हैं वोट

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Thu, 03 Oct 2019 10:52 PM IST
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नेपाल सीमा से लगे थपलियालखेड़ा गांव का लोकसभा व विधानसभा चुनाव का मतदान केंद्र। मगर पंचायती चुन? - फोटो : CHAMPAWAT
सैलानीगोठ ग्राम पंचायत के 120 मतदाताओं वाले गांव थपलियालखेड़ा के मतदाताओं को अपना प्रधान चुनने के लिए नेपाल सीमा लांघनी होगी। साथ ही मतदाताओं को छह किलोमीटर से अधिक का फासला भी तय करना होगा। सैलानीगोठ जीआईसी में बना बूथ जिले का सबसे अधिक दूरी वाला पोलिंग बूथ है। गौर करने वाली बात यह है कि गांव के लोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए अपने ही गांव में वोट देते हैं जहां उनकी दूरी बमुश्किल 200 मीटर है।
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तीन ओर से नेपाल सीमा से घिरे थपलियालखेड़ा गांव के चौथी ओर शारदा नदी है। जिला मुख्यालय से 81 किमी दूर का यह गांव भौगोलिक रूप से नेपाल से सटा है। पंचायती चुनाव के लिए थपलियालखेड़ा के लोगों को छह किमी दूर सैलानीगोठ राजकीय इंटर कॉलेज के बूथ में आना होगा जिसके लिए उन्हें नेपाल सीमा लांघने के साथ टनकपुर का बैराज पार करना होगा।
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चुनाव के मद्देनजर नेपाल सीमा सील होने से उन्हें समस्या होती है। खास बात यह है कि 2012 से यहां के लोग विधानसभा-लोकसभा चुनाव के लिए थपलियालखेड़ा के प्राथमिक विद्यालय में बने बूथ में वोट देते हैं।
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लोकसभा-विधानसभा और त्रिस्तरीय पंचायत और नगर निकायों के मतदान केंद्र की वोटर सूची अलग-अलग बनती है। सैलानीगोठ ग्राम पंचायत के थपलियालखेड़ा के लोगों का पंचायती चुनाव का मतदान केंद्र सैलानीगोठ जीआईसी है। मतदान के लिए ये दूरी बहुत ज्यादा है।
भविष्य में पंचायती चुनाव के लिए थपलियालखेड़ा गांव में ही मतदान केंद्र बनाने का प्रस्ताव चुनाव आयोग को भेजा जाएगा।
-सुरेंद्र नारायण पांडेय, जिलाधिकारी, चंपावत।
ज्यादातर परिवारों के पास नहीं हैं शौचालय
चंपावत। मतदान केंद्र से दूर थपलियालखेड़ा गांव का विकास से भी खूब फासला है। 230 की आबादी वाले इस गांव में किसी के पास भी सरकारी योजना से आवास नहीं है। एक प्राइमरी स्कूल को छोड़ इस गांव में न सरकारी पेयजल योजना है, न अस्पताल और न ही रोड। निवर्तमान ग्राम प्रधान बसंत राय बताते हैं कि सभी 42 परिवारों को सोलर लाइटें दी गई हैं लेकिन अधिकतर लोगों के पास शौचालय नहीं है। थपलियालखेड़ा में रोजगार का भी कोई जरिया नहीं है।

दूध बेचने के अलावा मजदूरी ही पेट पालने का आसरा है। खेती लायक जमीन भी महज 21 एकड़ है। प्रशासन का कहना है कि वन भूमि की वजह से थपलियालखेड़ा के विकास पर असर पड़ा है।
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