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कैलाश मानसरोवर पैदल यात्रा मार्ग की दुर्दशा
ब्यूरो, अमर उजाला थल (पिथौरागढ़)।
Updated Mon, 23 Oct 2017 11:15 PM IST
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कैलाश मानसरोवर जाने वाले पुराने टूटे पैदल रास्ते से निकलते स्कूली बच्चे।
- फोटो : अमर उजाला
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पहले कैलाश मानसरोवर यात्रा पैदल होती थी। यात्री अल्मोड़ा से पैदल चलकर बेड़ीनाग के रास्ते थल फिर डीडीहाट, अस्कोट, जौलजीबी होते हुए धारचूला को जाते थे। धारचूला से आगे का पैदल रास्ता अब भी वही है। 1955 में अल्मोड़ा से थल तक मोटर सड़क बन गई। 1960 में भारत और चीन के बीच संबंधों में कटुता आने के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा बंद हो गई थी। 1981 में जब यात्रा दुबारा शुरू हुई तो यात्रियों के लिए सड़क सुविधा उपलब्ध हो गई थी। यात्रियों की पैदल सफर की मजबूरी समाप्त हो गई लेकिन पैदल रास्ते का उपयोग आज भी स्थानीय गांवों के लोग करते जा रहे हैं।
इस पैदल रास्ते से सत्यालगांव, अलमियागांव, अलकाथल, भांतड़, साता, दड़मालगांव, अमतड़, हत्वालगांव, बलतड़ी, तिकतड़, पुरानाथल, डांगीगांव, जाजर, कालीविनायक, हजेती, गंगोरा, बड़ेत, उपराड़ा, कालासिला समेत सैकड़ों गांवों के लोग आवाजाही करते हैं। स्कूली बच्चे भी इसी रास्ते से आते जाते हैं। 1990 तक लोक निर्माण विभाग पैदल रास्ते की देखरेख करता था लेकिन बाद में उसने पैदल रास्ते की देखरेख के लिए लगाए मजदूर हटा दिए। लोनिवि के अधिकारियों का कहना है कि विभाग में मजदूरों की कमी है। लोनिवि का मुख्य काम मोटर सड़क की देखरेख है। अधिकांश इलाकों में अब सड़क संपर्क हो चुका है। इस कारण पैदल रास्तों पर तैनात होने वाले मजदूरों के लिए बजट नहीं आता। बारिश के समय यह रास्ता कई जगह टूट जाता है। गांव के लोग खुद ही श्रमदान से रास्ते की मरम्मत करते हैं। लोगों का कहना है कि इस ऐतिहासिक रास्ते की देखरेख की जानी चाहिए ताकि लोगों को सुविधा मिल सके।
पैदल रास्तों का अस्तित्व समाप्त नहीं होता
थल। स्थानीय निवासी हरीश जोशी का कहना है कि चाहे मोटर सड़क बन भी जाए तो पैदल रास्तों का अस्तित्व समाप्त नहीं होता। पहाड़ के हजारों गांवों तक जाने के लिए आज भी पैदल रास्ते ही हैं। उन्होंने कहा कि कैलाश मानसरोवर पैदल यात्रा मार्ग की तत्काल मरम्मत की जाए और इस रास्ते का धरोहर की तरह विकास किया जाए।
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पर्यटन विकास में उपयोग हो रास्ते का
थल। स्थानीय निवासी नवीन पाठक का कहना है कि कैलाश मानसरोवर पैदल यात्रा मार्ग अंग्रेजी शासन में बना था। अंग्रेजों ने इसे बनाते समय प्राकृतिक सौंदर्य का भी खास ध्यान दिया। यह रास्ता कई सुंदर जंगलों, खेतों और नदियों से होकर गुजरता है। इस रास्ते के सहारे पर्यटन विकास किया जा सकता है। यह बेहतरीन ट्रैकिंग रूट भी बन सकता है
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इस पैदल रास्ते से सत्यालगांव, अलमियागांव, अलकाथल, भांतड़, साता, दड़मालगांव, अमतड़, हत्वालगांव, बलतड़ी, तिकतड़, पुरानाथल, डांगीगांव, जाजर, कालीविनायक, हजेती, गंगोरा, बड़ेत, उपराड़ा, कालासिला समेत सैकड़ों गांवों के लोग आवाजाही करते हैं। स्कूली बच्चे भी इसी रास्ते से आते जाते हैं। 1990 तक लोक निर्माण विभाग पैदल रास्ते की देखरेख करता था लेकिन बाद में उसने पैदल रास्ते की देखरेख के लिए लगाए मजदूर हटा दिए। लोनिवि के अधिकारियों का कहना है कि विभाग में मजदूरों की कमी है। लोनिवि का मुख्य काम मोटर सड़क की देखरेख है। अधिकांश इलाकों में अब सड़क संपर्क हो चुका है। इस कारण पैदल रास्तों पर तैनात होने वाले मजदूरों के लिए बजट नहीं आता। बारिश के समय यह रास्ता कई जगह टूट जाता है। गांव के लोग खुद ही श्रमदान से रास्ते की मरम्मत करते हैं। लोगों का कहना है कि इस ऐतिहासिक रास्ते की देखरेख की जानी चाहिए ताकि लोगों को सुविधा मिल सके।
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पैदल रास्तों का अस्तित्व समाप्त नहीं होता
थल। स्थानीय निवासी हरीश जोशी का कहना है कि चाहे मोटर सड़क बन भी जाए तो पैदल रास्तों का अस्तित्व समाप्त नहीं होता। पहाड़ के हजारों गांवों तक जाने के लिए आज भी पैदल रास्ते ही हैं। उन्होंने कहा कि कैलाश मानसरोवर पैदल यात्रा मार्ग की तत्काल मरम्मत की जाए और इस रास्ते का धरोहर की तरह विकास किया जाए।
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पर्यटन विकास में उपयोग हो रास्ते का
थल। स्थानीय निवासी नवीन पाठक का कहना है कि कैलाश मानसरोवर पैदल यात्रा मार्ग अंग्रेजी शासन में बना था। अंग्रेजों ने इसे बनाते समय प्राकृतिक सौंदर्य का भी खास ध्यान दिया। यह रास्ता कई सुंदर जंगलों, खेतों और नदियों से होकर गुजरता है। इस रास्ते के सहारे पर्यटन विकास किया जा सकता है। यह बेहतरीन ट्रैकिंग रूट भी बन सकता है