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जिम कार्बेट ने चंपावत के लोगों को दिलाई थी नरभक्षी बाघों से मुक्ति
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चंपावत में जिम कार्बेट की ओर से मारे गए नरभक्षी बाघों का विवरण।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। मशहूर शिकारी जिम कार्बेट का चंपावत जिले के सीमांत क्षेत्र से खासा लगाव रहा। कुमाऊं एवं गढ़वाल के निवासी पिछली शताब्दी के दशकों में नरभक्षी बाघों एवं तेंदुओं के आतंक से ग्रसित थे। तब जिम कार्बेट ने 1907 में चंपावत में वर्तमान जिला मुख्यालय के समीप अपने जीवन के पहले नरभक्षी बाघिन का शिकार कर यहां के निवासियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस बाघिन ने 436 लोगों की जान ली थी। जो कि गिनीज बुक ऑफ द वर्ल्ड रिकार्ड में भी दर्ज है।
जिम कार्बेट ने 1909 में देवीधुरा मंदिर के निकट एक और नरभक्षी बाघ को मारने का प्रयास किया परंतु वह उसे खोज पाने में असफल रहा था। इसके बाद जिम कार्बेट ने 1929 में चंपावत के तल्लादेश के ग्राम ठूलाकोट में नरभक्षी बाघ को मौत के घाट उतारा था। तल्लादेश में बाघ के शिकार के लिए वह टनकपुर, ब्रहमदेव, पूर्णागिरि तथा चूका होते हुए ठूलाकोट पहुंचा था। काली नदी और लधिया नदी के संगम चूका में उसने अप्रैल 1938 में एक और नरभक्षी का अंत किया। इसके अलावा 30 नवंबर 1938 को पूर्णागिरि के पुजारियों के गांव टाक में एक और नरभक्षी बाघिन उसके हाथों शिकार हुई। जिम कार्बेट ने 1946 में अंतिम नरभक्षी बाघ का शिकार भी चंपावत जिले की लधियाघाटी में किया था।
नहीं बन सका कार्बेट से जुड़े सामानों का संग्रहालय
चंपावत। जिम कार्बेट अपने शिकार के दौरान वन विभाग के मंच, तामली, चूका और कलढूंगा के डाक बंगलों में प्रवास करते थे। उप प्रभागीय वनाधिकारी एमएम भट्ट के अनुसार वन विभाग की ओर से कार्बेट से जुड़े सामानों का संग्रहालय और डाक बंगलों को संरक्षित रखने की कार्ययोजना शासन को भेजी गई है।
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पर्यटन विभाग करेगा कार्बेट ट्रैल का निर्माण
चंपावत। जिले में थर्टीन डिस्ट्रिक थर्टीन डेस्टिनेशन के तहत पर्यटन विभाग की ओर से जिम कार्बेट ट्र्रैल का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है। जिला पर्यटन विकास अधिकारी लता बिष्ट के अनुसार कार्बेट ट्रैल के निर्माण को मुख्यमंत्री की घोषणा में शामिल कर सीडीओ की अध्यक्षता में क्रियान्वयन इकाई का गठन किया गया है। जिसमें जिम कार्बेट से जुड़े स्थलों को विकसित किया जाएगा।
अब तक सहेजी नहीं जा सकी कार्बेट की दी गई खुकरी
चंपावत। जिला मुख्यालय के गौड़ी गांव में गत वर्ष जिम कार्बेट की ओर से एक ग्रामीण को इनाम में दी गई खुकरी के साथ कई अन्य सामान भी मिला था। जिसकी पुरातत्व विभाग की ओर से जांच भी की गई थी। खुकरी सहित अन्य सामान अब तक संग्रहालय में नहीं रखे जा सके हैं।
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जिम कार्बेट ने 1909 में देवीधुरा मंदिर के निकट एक और नरभक्षी बाघ को मारने का प्रयास किया परंतु वह उसे खोज पाने में असफल रहा था। इसके बाद जिम कार्बेट ने 1929 में चंपावत के तल्लादेश के ग्राम ठूलाकोट में नरभक्षी बाघ को मौत के घाट उतारा था। तल्लादेश में बाघ के शिकार के लिए वह टनकपुर, ब्रहमदेव, पूर्णागिरि तथा चूका होते हुए ठूलाकोट पहुंचा था। काली नदी और लधिया नदी के संगम चूका में उसने अप्रैल 1938 में एक और नरभक्षी का अंत किया। इसके अलावा 30 नवंबर 1938 को पूर्णागिरि के पुजारियों के गांव टाक में एक और नरभक्षी बाघिन उसके हाथों शिकार हुई। जिम कार्बेट ने 1946 में अंतिम नरभक्षी बाघ का शिकार भी चंपावत जिले की लधियाघाटी में किया था।
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नहीं बन सका कार्बेट से जुड़े सामानों का संग्रहालय
चंपावत। जिम कार्बेट अपने शिकार के दौरान वन विभाग के मंच, तामली, चूका और कलढूंगा के डाक बंगलों में प्रवास करते थे। उप प्रभागीय वनाधिकारी एमएम भट्ट के अनुसार वन विभाग की ओर से कार्बेट से जुड़े सामानों का संग्रहालय और डाक बंगलों को संरक्षित रखने की कार्ययोजना शासन को भेजी गई है।
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पर्यटन विभाग करेगा कार्बेट ट्रैल का निर्माण
चंपावत। जिले में थर्टीन डिस्ट्रिक थर्टीन डेस्टिनेशन के तहत पर्यटन विभाग की ओर से जिम कार्बेट ट्र्रैल का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है। जिला पर्यटन विकास अधिकारी लता बिष्ट के अनुसार कार्बेट ट्रैल के निर्माण को मुख्यमंत्री की घोषणा में शामिल कर सीडीओ की अध्यक्षता में क्रियान्वयन इकाई का गठन किया गया है। जिसमें जिम कार्बेट से जुड़े स्थलों को विकसित किया जाएगा।
अब तक सहेजी नहीं जा सकी कार्बेट की दी गई खुकरी
चंपावत। जिला मुख्यालय के गौड़ी गांव में गत वर्ष जिम कार्बेट की ओर से एक ग्रामीण को इनाम में दी गई खुकरी के साथ कई अन्य सामान भी मिला था। जिसकी पुरातत्व विभाग की ओर से जांच भी की गई थी। खुकरी सहित अन्य सामान अब तक संग्रहालय में नहीं रखे जा सके हैं।