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जेल ही नहीं लॉकअप भी बन गया था यातना शिविर

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Fri, 24 Jun 2022 11:36 PM IST
इमरजेंसी में जेल गए विद्या भारती के प्रदेश निरीक्षक सुरेश पांडेय। संवाद न्यूज एजेंसी
इमरजेंसी में जेल गए विद्या भारती के प्रदेश निरीक्षक सुरेश पांडेय। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। 13 नवंबर 1975 से जुलाई 1976 के बीच जेल के आठ महीने और उसके बाद आपातकाल तक का पूरा मंजर आज भी याद है। वे जुल्म, वे यातनाएं और इससे बढ़कर अमानवीयता का दर्द आपात काल के 47 साल बाद भी ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो। आखिर उसे भूलें भी तो कैसे? 78 वर्षीय विद्या भारती शिक्षा समिति के प्रदेश निरीक्षक रहे सुरेश चंद्र पांडेय कहते हैं कि लोकतंत्र की लाज बचाने और तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने की इतनी कीमत तो चुकानी ही थी।

आपातकाल के दौर में आचार्य पांडेय की उम्र महज 31 साल थी। युवा पांडेय तब हल्द्वानी के सरस्वती शिशु मंदिर में बच्चों का भविष्य संवारते थे। शिशु मंदिर के अलावा आचार्यों के आवासों पर खुफिया पुलिस और प्रशासन की नजर आपातकाल लगने वाले दिन से ही थी। जैसे-तैसे पौने चार माह तक गुपचुप विरोध करते रहे लेकिन 13 नवंबर की रात पुलिस ने घर को चारों तरफ से घेर उन्हें दबोच लिया। पांच अन्य लोगों के साथ उन्हें हल्द्वानी के लॉकअप में रखा गया। यहीं से शुरू हुई जुल्म की दास्तान। छोटे से लॉकअप में एक नहीं, छह दिन हिरासत में रखा गया। न पानी की खास व्यवस्था और न शौचालय की। लॉकअप की क्षमता ज्यादा से ज्यादा दो लोगों के रखे जाने की थी। अमानवीय हालात में ज्यादातर वक्त भूखे-प्यासे काटा। आचार्य पांडेय बताते हैं कि लॉकअप के वे छह दिन किसी यातना शिविर से कम नहीं थे। उसके बाद जेल में जुल्म की दूसरी पारी शुरू हुई।

डीआईआर एक्ट के तहत 18 नवंबर की शाम को मुकदमा दर्ज कर हल्द्वानी जेल भेजा गया। कुछ समय बाद हल्द्वानी जेल से उन्हें कुछ अन्य साथियों के साथ बरेली केंद्रीय कारागार भेज दिया गया। जेल अवधि में परिवार और नाते रिश्तेदारों से कोई संपर्क नहीं था। जेल प्रशासन भी परिवार से मिलने नहीं देता था। संपर्क का कोई दूसरा जरिया भी नहीं था। पूरी तरह दुनिया से कटे हुए थे। बरेली जेल से नैनीताल अदालत में पेशी के दौरान ही कुछ लोगों से दूर से नजरें मिल पातीं थीं। आपातकाल के खिलाफ लड़ रहे लोगों को हथकड़ी के साथ पेशी के लिए लाया जाता था। उनकी बस एक पहचान होती थी और वह थी लगाए जाने वाले भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे।
राजनीतिक कैदी की सुविधा के लिए जेल में आवाज उठाने के बाद मार्च 1976 में सुविधाओं में कुछ इजाफा हुआ। खाने में सुधार के साथ पत्रिकाएं भी मिलीं। सेवानिवृत्त प्रदेश निरीक्षक पांडेय बताते हैं कि जुलाई 1976 में जमानत मिली लेकिन सील किया घर और सामान नवंबर 1977 में मिल सका। संवाद
21 महीनों तक कुचला गया था लोकतंत्र
चंपावत। 25 जून 1975 वह तारीख, जिसने लोगों के अधिकारों को छीनने के साथ लोकतंत्र को कुचलते हुए आपातकाल के जख्म दिए। देशभर में हजारों लोग गिरफ्तार हुए। करीब 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 तक रहे आपातकाल के दौरान विपक्षी नेताओं और आपातकाल का विरोध करने वाले लोगों को खूब कष्ट झेलने पड़े। लोगों में किस कदर गुस्सा था, इसका अहसास आपातकाल के बाद मार्च 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में हुआ जब लोगों ने पहली बार कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया।

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