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काव्य गोष्ठियों से हो रही हिंदी बचाने की कोशिश
सतीश जोशी ‘सत्तू’/अमर उजाला, चंपावत
Updated Sun, 13 Sep 2015 10:40 PM IST
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हिंदी दिवस पर हिंदी की चहक सातवें आसमान पर होती है। हिंदी को लेकर अपनापन भी इस पखवाड़े खूब झलकता है। स्तुतिगान भी खूब होता है, लेकिन हिंदी की वास्तविकता यह कि इन चंद दिनों के बाद हिंदी फिर कहीं गुम हो जाती है। अलबत्ता चंपावत में 2013 से हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए काव्य गोष्ठी और अन्य साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। डा.बीसी जोशी का कहना है कि चेतना मंच के माध्यम से होने वाली इस मासिक गोष्ठी से लोगों को हिंदी साहित्य से जोड़ने के साथ ही नई प्रतिभाओं को मंच देने का प्रयास किया जा रहा है। अमर उजाला ने हिंदी की मौजूदा हालात को लेकर शिक्षाविद् और बुद्धिजीवियों से उनकी प्रतिक्रिया जानी।
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सिर्फ वोट लेने तक होता है हिंदी का उपयोग
हिंदी के रिटायर्ड प्रवक्ता किशन जोशी ने कहा कि हिंदी आम लोगों की भाषा होने से जनवाणी तो है, लेकिन सत्ता की चौखट पर यह दुत्कारी जाती रही। इसका उपयोग सियासत वोट लेने के लिए और कंपनियां सामान बेचने तक ही करती है। हिंदी बोलने वाले तबके की राय नीतियों के निर्माण में मायने नहीं रखती। यह गुलाम मन:स्थिति का प्रतिबिंब है।
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रोजगार से जुड़े तब बढ़ेगा कारवां
राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता और रिटायर्ड प्रधानाचार्य डा.बीसी जोशी ने कहा कि हिंदी का ओहदा राजभाषा से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। सरकारी कामकाजी भाषा के साथ ही रोजगार से जोड़े बगैर हिंदी की स्वीकारोक्ति नहीं हो सकती है। हिंदी का सरलीकरण, शब्दकोष और प्रमाणिक पुस्तकें स्कूलों तक पहुंचाई जानी चाहिए।
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ज्ञान-विज्ञान में पीछे हैं हिंदी
रिटायर्ड प्रवक्ता डा.कीर्ति बल्लभ सक्टा ने कहा कि हिंदी में फिल्में खूब देखी जाती है। मनोरंजन भी हिंदी ही कराती है, लेकिन ज्ञान और विज्ञान की जानकारी देने में यह पीछे है। इस मामले में अंग्रेजी मीलों आगे हैं। स्तरीय और प्रमाणिक पुस्तकों का अभाव है। इस कमी से पढ़ने वालों का हिंदी के प्रति आकर्षण कम हो रहा है।
तोड़नी होगी भाषाई गुलामी : डा.जोशी
जनकवि प्रकाश जोशी शूल ने कहा कि राष्ट्रभाषा के बगैर आजादी के 68 साल बाद भी हमारी स्वतंत्रता अधूरी है। भाषा के बगैर न संस्कृति संरक्षित हो सकती है, नहीं समाज में समानता मुमकिन है। अंग्रेजी ने हिंदी की हालत दासी सरीखी बना दी है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को गले लगाए बगैर देश की पूर्ण आजादी संभव नहीं है।