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पौधरोपण महोत्सव में तब्दील हुआ हरेला पर्व
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चंपावत। जिले में हरेेला पर्व धूमधाम से मनाया गया। कई जगह हरेला पर्व पौधरोपण महोत्सव में तब्दील हो गया। विश्व पर्यावरण दिवस पर पांच जून की तरह लोगों और युवाओं का हुजूम पौधरोपण करने उमड़ा। सोशल मीडिया में पौधरोपण संबंधी फोटो शेयर करने की होड़ मची रही। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों में लोग एक-दूसरे को वन एवं पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझाते हुए पौधरोपण की अपील करते नजर आए। वन विभाग, उद्यान विभाग और भेषज संघ आदि सरकारी विभागों समेत विभिन्न स्थानों पर बड़े पैमाने पर लोगों ने पौधरोपण किया। वन विभाग ने पिछले वर्ष हरेले पर पहली बार रिकॉर्ड 9.06 लाख पौधे रोपे थे। इस वर्ष भी लोगों ने स्वत: स्फूर्त तरीके से चार लाख से अधिक पौधे रोपे। उद्यान विभाग सचल केंद्र प्रभारी निधि जोशी ने बताया कि सचल वाहन सेवा की ओर से शिक्षा विभाग, पुलिस विभाग, एसएसबी समेत स्थानीय किसानों को लीची और सिटरस प्रजाति के पौधे बांटे गए।
छायादार, फलदार पौधों के साथ औषधि प्रजाति के पौधे बांटे गए
चंपावत। हरेले पर वन विभाग और उद्यान विभाग ने छायादार और फलदार पौधे बांटे जबकि जड़ी बूटी और भेषज संघ की ओर से औषधीय प्रजातियों के आंवला, रीठा, तेजपत्ता, गिलोई आदि पौधे बांटे गए। भेषज समन्वयक कमलेंद्र यादव ने बताया कि सभी स्थानों पर औषधीय प्रजाति के पौधे बांटे जा रहे हैं। (संवाद)
कोरोना के कारण बाजार में नहीं मिले स्थानीय आम और केले
चंपावत। कोरोना महामारी के कारण जिला मुख्यालय में लगातार दूसरे साल भी हरेला मेले का आयोजन नहीं हो सका। इस कारण शुक्रवार को बाजार में स्थानीय आम और केले बिक्री के लिए नहीं पहुंच पाए जबकि पहले हरेला मेले में आम और केलों समेत कई स्थानीय उत्पाद बड़ी संख्या में बिकने लाए जाते थे। (संवाद)
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छायादार, फलदार पौधों के साथ औषधि प्रजाति के पौधे बांटे गए
चंपावत। हरेले पर वन विभाग और उद्यान विभाग ने छायादार और फलदार पौधे बांटे जबकि जड़ी बूटी और भेषज संघ की ओर से औषधीय प्रजातियों के आंवला, रीठा, तेजपत्ता, गिलोई आदि पौधे बांटे गए। भेषज समन्वयक कमलेंद्र यादव ने बताया कि सभी स्थानों पर औषधीय प्रजाति के पौधे बांटे जा रहे हैं। (संवाद)
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कोरोना के कारण बाजार में नहीं मिले स्थानीय आम और केले
चंपावत। कोरोना महामारी के कारण जिला मुख्यालय में लगातार दूसरे साल भी हरेला मेले का आयोजन नहीं हो सका। इस कारण शुक्रवार को बाजार में स्थानीय आम और केले बिक्री के लिए नहीं पहुंच पाए जबकि पहले हरेला मेले में आम और केलों समेत कई स्थानीय उत्पाद बड़ी संख्या में बिकने लाए जाते थे। (संवाद)
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