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मां पूर्णागिरि धाम के विकास में रोड़ा बना वन क्षेत्र
अमर उजाला ब्यूूूूराे चंपावत
Updated Mon, 15 Jan 2018 10:50 PM IST
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मां श्री पूर्णागिरि धाम का मुख्य मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक मां पूर्णागिरि धाम के विकास में वन क्षेत्र आड़े आ रहा है। बूम से मुख्य मंदिर तक के करीब 12 किमी के क्षेत्र में से करीब 95 प्रतिशत वन क्षेत्र है। यहां आरक्षित वन क्षेत्र में गैर वानिकी गतिविधियों पर 2010 में लगी रोक के बाद से मेले के आयोजन में परेशानी आ रही है। इसके चलते धाम में वन भूमि को लीज पर लेने का प्रस्ताव शुरू किया गया, मगर यह मामला भी लटक गया है। धाम में हर साल 25 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं। मगर वन भूमि के चलते मेले की आयोजक संस्था जिला पंचायत दूरदराज से आने वाले तीर्थ यात्रियों को विशेष सुविधा नहीं दे पा रही है।
होली के अगले दिन से शुरू हो करीब 100 दिन तक चलने वाले मां पूर्णागिरि धाम के मेले के आयोजन में वन क्षेत्र के चलते कानूनी प्रावधान आड़े आ रहे हैं। जिला पंचायत ने मेला क्षेत्र के कुछ हिस्से को जरूरी व्यवस्था के लिए लीज पर लेने की कवायद शुरू की थी। पंचायत ने एक-एक हेक्टेयर क्षेत्र के तीन प्रस्ताव तैयार कर इस स्थान का उपयोग अस्थाई यात्री शेड, पार्किंग, सरकारी विभागों के लिए कार्यालय, आवासीय व्यवस्था, स्वास्थ्य शिविर, अस्थायी थाना, फायर स्टेशन आदि के लिए किया जाना प्रस्तावित है।
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लेकिन दिसंबर 2015 में हुई ये कवायद भी किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। जिला पंचायत के अधिकारियों का कहना है कि मां पूर्णागिरि धाम को पूर्णागिरि विकास प्राधिकरण बनाए जाने के प्रस्ताव के चलते लीज प्रक्रिया फिलहाल स्थगित की गई है। बूम से लेकर मां पूर्णागिरि के मुख्य मंदिर तक का करीब 12 किमी के क्षेत्र का 95 प्रतिशत हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्र में आता है। डीएफओ केएस बिष्ट का कहना है कि वन क्षेत्र में किसी भी तरह का गैर वानिकी कार्य प्रतिबंधित है। इस वजह से 2010 से जिला पंचायत वन क्षेत्र में होने वाले मेले के दौरान नीलामी भी नहीं करा पा रहा है।
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कोट
मां पूर्णागिरि धाम का अधिकांश हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्र में आता है। इसके लिए लीज का प्रस्ताव किया गया था। मगर अभी इस पर कोई निर्णय नहीं हो सका है। वन क्षेत्र आने से जिला पंचायत तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशाला सहित अन्य जरूरी सुविधा देने के काम नहीं करा पा रही है।
राजेश कुमार,
अपर मुख्य अधिकारी,
जिला पंचायत, चंपावत।
कोट
वन भूमि के चलते पूर्णागिरि धाम का विकास, तीर्थ यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं। मेला क्षेत्र से जुड़े कारोबारी, धर्मशाला के संचालकों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। करीब 150 लोगों के वन विभाग ने चालान काटे हैं। मां के मुख्य मंदिर की पहाड़ी के ट्रीटमेंट के अलावा धाम में पेयजल, बिजली आदि व्यवस्थाओं का पुख्ता प्रबंध जरूरी है।
पंडित किशन तिवारी,
पूर्व अध्यक्ष, मंदिर समिति,
मां पूर्णागिरि धाम।
2012 से शासन से नहीं मिला मेला अनुदान
जिले के सबसे बड़े मां पूर्णागिरि धाम के मेले में 2008 तक नियमित रूप से प्रदेश सरकार मेला अनुदान देती थी। राज्य बनने के बाद हुए पहले सरकारी मेले में 2001 में 22 लाख रुपये अनुदान मिला था। जो 2008 तक घटकर 15 लाख तक पहुंचा। मगर इसके बाद से एक बार को छोड़ मेले के लिए सरकारी अनुदान नहीं मिला। 2011 में प्रदेश सरकार ने आखिरी बार पांच लाख रुपये का अनुदान दिया। इसके बाद से अनुदान के रूप में एक भी रुपया नहीं मिला है।
पिछले साल ही 12 लाख रुपये का नुकसान हुआ
होली के बाद शुरू होने वाले सरकारी मेले की सारी व्यवस्था जिला पंचायत कराती है, लेकिन धन की कमी उसके आड़े आ रही है। 2017 में हुए मेले में जिला पंचायत को 12.08 लाख रुपये का नुकसान हुआ। विभिन्न मदों से मेले की आयोजक संस्था को कुल 1.55 करोड़ रुपये मिले, जबकि खर्च 1.67 करोड़ रुपये हुआ। आयोजन में बिजली, स्वास्थ्य, सफाई समेत विभिन्न मदों पर मुख्य रूप से खर्च होता है।