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न डंडा न ही परिचय पत्र, ये हैं गांवों के चौकीदार
Sat, 23 Mar 2019 11:01 PM IST
बृजमोहन बृजमोहन
चंद्रशेखर जोशी चंपावत।
चंद्रशेखर जोशी चंपावत।
Published by: बृजमोहन बृजमोहन
Updated Sat, 23 Mar 2019 11:01 PM IST
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ग्राम प्रहरी कुशल राम।
- फोटो : अमर उजाला
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लोकसभा चुनाव के पहले देश की सियासत में चौकीदार मुद्दा बन गया है। 20 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के 25 लाख चौकीदारों को संबोधित किया। खुद को चौकीदार बताते हुए भाजपा और उसके प्रमुख नेता अपने नाम के आगे चौकीदार लिख रहे हैं। वहीं कांग्रेस चौकीदार की भूमिका पर सवाल उठा रही है लेकिन गांवों में कानून व्यवस्था को संवारने में अहम भूमिका निभाने वाले ग्राम प्रहरियों (चौकीदार) का कोई सुधलेवा नहीं है। इन चौकीदारों का दैनिक मानदेय 67 रुपये से भी कम है। ये मानदेय मनरेगा मजदूरों के मानदेय के आधे से भी कम है।
सिर्फ मानदेय ही नहीं अन्य जरूरी सुविधाओं से भी ये चौकीदार वंचित हैं। उनके पास डंडा, यूनिफार्म और परिचय पत्र भी नहीं है। पुलिस की मदद करने के लिए करीब डेढ़ दशक पूर्व प्रदेशभर में ग्राम प्रहरियों की तैनाती की गई थी। 313 ग्राम पंचायत वाले इस जिले में फिलहाल 130 ग्राम प्रहरी हैं। अपराध नियंत्रण में पुलिस का सहयोग करने की अहम जिम्मेदारी के बावजूद उन्हें मानदेय के तौर पर महज 2000 रुपये प्रति माह मिल रहे हैं। ये मानदेय आम मजदूरों से भी कम है।
ये हैं काम
पुलिस अधीक्षक धीरेंद्र गुंज्याल का कहना है कि दूरदराज के गांवों में पुलिस को अपराध नियंत्रण में मदद करना ग्राम प्रहरियों की मुख्य जिम्मेदारी है। गांवों में फेरी वाले, संदिग्ध व्यक्तियों की मौजूदगी से लेकर किसी भी तरह की अवांछित गतिविधियों की जानकारी पुलिस तक पहुंचाने का काम इन प्रहरियों का है। कुछ जगहों में प्रहरियों को चौकी और बैरियर में भी जिम्मेदारी दी गई हैं। बोर्ड परीक्षाओं, मां पूर्णागिरि धाम मेले, चुनावों के दौरान में भी उन्हें जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
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कई बार मांग करने के बावजूद नहीं मिला परिचय पत्र
धरसौं गांव के स्नातक पास कुशल राम 15 साल से ग्राम प्रहरी हैं। उनका कहना है कि कई बार मांग करने के बावजूद उन्हें अन्य सुविधाएं तो दूर एक परिचय पत्र तक नहीं मिला है। इसके चलते उन्हें अक्सर ड्यूटी का निर्वहन करने में दिक्कत आती है।
जिम्मेदारी के हिसाब से बढ़ाएं मानदेय
परेवा गांव के मोहन सिंह का कहना है कि दो हजार रुपये का मानदेय काफी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों के अपराधों की रोकथाम में उनकी जिम्मेदारियों को देखते हुए इसमें बढ़ोतरी की जानी चाहिए।
बेहतर तरीके से काम करने को दिया जाएं सुविधाएं
रीठा साहिब के ग्राम प्रहरी छतर सिंह बोहरा का कहना है कि उन्हें ड्यूटी के लिए न डंडा दिया जाता है और न ही यूनिफार्म। अपने काम को बेहतर तरीके से निभाने के लिए डंडा और यूनिफार्म दिया जाना चाहिए।
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सिर्फ मानदेय ही नहीं अन्य जरूरी सुविधाओं से भी ये चौकीदार वंचित हैं। उनके पास डंडा, यूनिफार्म और परिचय पत्र भी नहीं है। पुलिस की मदद करने के लिए करीब डेढ़ दशक पूर्व प्रदेशभर में ग्राम प्रहरियों की तैनाती की गई थी। 313 ग्राम पंचायत वाले इस जिले में फिलहाल 130 ग्राम प्रहरी हैं। अपराध नियंत्रण में पुलिस का सहयोग करने की अहम जिम्मेदारी के बावजूद उन्हें मानदेय के तौर पर महज 2000 रुपये प्रति माह मिल रहे हैं। ये मानदेय आम मजदूरों से भी कम है।
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ये हैं काम
पुलिस अधीक्षक धीरेंद्र गुंज्याल का कहना है कि दूरदराज के गांवों में पुलिस को अपराध नियंत्रण में मदद करना ग्राम प्रहरियों की मुख्य जिम्मेदारी है। गांवों में फेरी वाले, संदिग्ध व्यक्तियों की मौजूदगी से लेकर किसी भी तरह की अवांछित गतिविधियों की जानकारी पुलिस तक पहुंचाने का काम इन प्रहरियों का है। कुछ जगहों में प्रहरियों को चौकी और बैरियर में भी जिम्मेदारी दी गई हैं। बोर्ड परीक्षाओं, मां पूर्णागिरि धाम मेले, चुनावों के दौरान में भी उन्हें जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
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कई बार मांग करने के बावजूद नहीं मिला परिचय पत्र
धरसौं गांव के स्नातक पास कुशल राम 15 साल से ग्राम प्रहरी हैं। उनका कहना है कि कई बार मांग करने के बावजूद उन्हें अन्य सुविधाएं तो दूर एक परिचय पत्र तक नहीं मिला है। इसके चलते उन्हें अक्सर ड्यूटी का निर्वहन करने में दिक्कत आती है।
जिम्मेदारी के हिसाब से बढ़ाएं मानदेय
परेवा गांव के मोहन सिंह का कहना है कि दो हजार रुपये का मानदेय काफी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों के अपराधों की रोकथाम में उनकी जिम्मेदारियों को देखते हुए इसमें बढ़ोतरी की जानी चाहिए।
बेहतर तरीके से काम करने को दिया जाएं सुविधाएं
रीठा साहिब के ग्राम प्रहरी छतर सिंह बोहरा का कहना है कि उन्हें ड्यूटी के लिए न डंडा दिया जाता है और न ही यूनिफार्म। अपने काम को बेहतर तरीके से निभाने के लिए डंडा और यूनिफार्म दिया जाना चाहिए।