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Champawat News: अंग्रेजी हुकूमत भी नहीं रोक सकी देवीधुरा की बगवाल
Thu, 27 Aug 2026 12:49 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Thu, 27 Aug 2026 12:49 AM IST
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चंपावत। जिले के प्रसिद्ध मां बाराही धाम देवीधुरा में रक्षाबंधन के दिन होने वाला विश्वप्रसिद्ध बगवाल मेला सदियों पुरानी लोकपरंपरा और आस्था का अनूठा संगम है। देश-विदेश से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए बगवाल केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था का प्रतीक है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
मंदिर के पीठाचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी के अनुसार बगवाल की परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि एक समय अंग्रेज अधिकारी ने बगवाल की परंपरा रोकने और गोबर व रबर से बगवाल खेलने का आदेश दिया था। मान्यता है कि इसके बाद अंग्रेज अधिकारी का स्वास्थ्य खराब हो गया और उसे अपना आदेश वापस लेना पड़ा।
नरबलि की परंपरा से बगवाल तक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सदियों पहले मां बाराही धाम में चार खामों—चम्याल, गहड़वाल, लमड़िया और वालिक—के बीच नरबलि देने की परंपरा थी। मान्यता है कि चम्याल खाम की बारी आने पर एक वृद्धा ने अपने इकलौते पौत्र को बचाने के लिए मां बाराही की तपस्या की। कहा जाता है कि वृद्धा की तपस्या से प्रसन्न होकर मां बाराही ने चारों खामों के लोगों को नरबलि के स्थान पर बगवाल खेलने की अनुमति दी। तभी से चारों खामों के लोग रक्षाबंधन के दिन बगवाल खेलते आ रहे हैं। मान्यता के अनुसार बगवाल में एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहाने की परंपरा है। इसी धार्मिक मान्यता के चलते बगवाल वीर सदियों से इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं।
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मंदिर के पीठाचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी के अनुसार बगवाल की परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि एक समय अंग्रेज अधिकारी ने बगवाल की परंपरा रोकने और गोबर व रबर से बगवाल खेलने का आदेश दिया था। मान्यता है कि इसके बाद अंग्रेज अधिकारी का स्वास्थ्य खराब हो गया और उसे अपना आदेश वापस लेना पड़ा।
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नरबलि की परंपरा से बगवाल तक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सदियों पहले मां बाराही धाम में चार खामों—चम्याल, गहड़वाल, लमड़िया और वालिक—के बीच नरबलि देने की परंपरा थी। मान्यता है कि चम्याल खाम की बारी आने पर एक वृद्धा ने अपने इकलौते पौत्र को बचाने के लिए मां बाराही की तपस्या की। कहा जाता है कि वृद्धा की तपस्या से प्रसन्न होकर मां बाराही ने चारों खामों के लोगों को नरबलि के स्थान पर बगवाल खेलने की अनुमति दी। तभी से चारों खामों के लोग रक्षाबंधन के दिन बगवाल खेलते आ रहे हैं। मान्यता के अनुसार बगवाल में एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहाने की परंपरा है। इसी धार्मिक मान्यता के चलते बगवाल वीर सदियों से इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं।
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