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महिलाओं के जीवन में भी उजाला कर रहीं बिजली की झालरें
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दिगालीचौड़ में एलईडी झालर बनातीं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं। फोटो: संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत (चंद्रशेखर जोशी)। नेपाल सीमा से लगे गुमदेश का दिगालीचौड़ इलाका पिछड़ा जरूर हैं पर यहां की महिलाएं घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं हैं। महिलाओं ने बिजली की झालर बनाने का प्रशिक्षण लेकर खुद को लघु उद्यमी के तौर पर स्थापित किया है। झालरें तैयार कर महिलाओं ने अपनी आर्थिकी को भी रोशन किया है।
दिगालीचौड़ की खेतीबाड़ी से जुड़ी बिजली की झालरें तैयार कर न केवल अपनी आय बढ़ा रहीं हैं बल्कि दूसरी महिलाओं के लिए मिसाल भी पेश कर रही हैं। दो साल से इस क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं की तैयार एलईडी झालर की दिवाली में खूब मांग है। 40 से 200 मीटर लंबी झालर 100 से 400 रुपये की मिल रही है। झालर खराब होने पर इसकी मरम्मत भी आसानी से हो जाती है। 40 से अधिक महिलाएं इन झालरों से एक माह में 750 से डेढ़ हजार रुपये तक कमा रही हैं। स्थानीय लोगों के अलावा सरकारी विभाग भी झालरों के खरीदार हैं।
हरियाली स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष देवकी देवी और कुछ अन्य महिलाओं ने दो साल पहले आरसेटी (ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। धीरे-धीरे अन्य महिलाओं ने भी प्रशिक्षण में दिलचस्पी दिखाई। अब महिलाएं कच्चा माल देहरादून, बरेली से लाकर झालर तैयार कर रही हैं। आरसेटी के निदेशक आरपी टम्टा ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को झालर बनाने की अनुमति दी। संवाद
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दिगालीचौड़ क्षेत्र के पिछड़ा होने से इस काम में शुरुआत में काफी अड़चनें आईं। समय की कमी के साथ महिलाएं शुरुआत में घरों से भी बाहर निकलने में हिचकती थी। प्रेरित करने के बाद महिलाओं ने प्रशिक्षण लिया और अब वे अच्छी आय प्राप्त कर रही हैं। - देवकी देवी, अध्यक्ष, हरियाली स्वयं सहायता समूह, दिगालीचौड़।
झालर बना रहे महिला समूह और महिलाएं
हरियाली स्वयं सहायता समूह, ब्रहमदेव, एकता, मां अखिलतारिणी और सिद्धबाबा स्वयं सहायता समूह।
तारा देवी, गीता उप्रेती, कमला, गोविंदी, सुनीता देवी, शांति देवी, संगीता, पार्वती आदि।
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दिगालीचौड़ की खेतीबाड़ी से जुड़ी बिजली की झालरें तैयार कर न केवल अपनी आय बढ़ा रहीं हैं बल्कि दूसरी महिलाओं के लिए मिसाल भी पेश कर रही हैं। दो साल से इस क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं की तैयार एलईडी झालर की दिवाली में खूब मांग है। 40 से 200 मीटर लंबी झालर 100 से 400 रुपये की मिल रही है। झालर खराब होने पर इसकी मरम्मत भी आसानी से हो जाती है। 40 से अधिक महिलाएं इन झालरों से एक माह में 750 से डेढ़ हजार रुपये तक कमा रही हैं। स्थानीय लोगों के अलावा सरकारी विभाग भी झालरों के खरीदार हैं।
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हरियाली स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष देवकी देवी और कुछ अन्य महिलाओं ने दो साल पहले आरसेटी (ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। धीरे-धीरे अन्य महिलाओं ने भी प्रशिक्षण में दिलचस्पी दिखाई। अब महिलाएं कच्चा माल देहरादून, बरेली से लाकर झालर तैयार कर रही हैं। आरसेटी के निदेशक आरपी टम्टा ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को झालर बनाने की अनुमति दी। संवाद
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दिगालीचौड़ क्षेत्र के पिछड़ा होने से इस काम में शुरुआत में काफी अड़चनें आईं। समय की कमी के साथ महिलाएं शुरुआत में घरों से भी बाहर निकलने में हिचकती थी। प्रेरित करने के बाद महिलाओं ने प्रशिक्षण लिया और अब वे अच्छी आय प्राप्त कर रही हैं। - देवकी देवी, अध्यक्ष, हरियाली स्वयं सहायता समूह, दिगालीचौड़।
झालर बना रहे महिला समूह और महिलाएं
हरियाली स्वयं सहायता समूह, ब्रहमदेव, एकता, मां अखिलतारिणी और सिद्धबाबा स्वयं सहायता समूह।
तारा देवी, गीता उप्रेती, कमला, गोविंदी, सुनीता देवी, शांति देवी, संगीता, पार्वती आदि।