{"_id":"647cc4cd94de7ec3c70d14a8","slug":"dangerous-pirul-is-becoming-a-source-of-employment-for-the-forest-champawat-news-c-8-1-159204-2023-06-04","type":"story","status":"publish","title_hn":"Champawat News: जंगल के लिए खतरनाक पिरूल बन रहा रोजगार का जरिया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Champawat News: जंगल के लिए खतरनाक पिरूल बन रहा रोजगार का जरिया
Sun, 04 Jun 2023 10:37 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Sun, 04 Jun 2023 10:37 PM IST
विज्ञापन
चंपावत में लगे स्टॉल में पिरूल के सामान की जानकारी देतीं उप प्रभागीय वनाधिकारी नेहा चौधरी। संवा
चंपावत। चीड़ के पेड़ों को जंगल में आग लगने का मुख्य कारण माना जाता है लेकिन अब यही चीड़ गांवों में महिलाओं को रोजगार देने के साथ ही अपने उत्पादों से पर्यावरण को भी संवारने का काम कर रहा है। चीड़ की पत्तियों से निकलने वाले पिरूल से टोकरी, बैग, पर्स, टोपी, टी कोस्टर, राखी से लेकर आभूषण (कर्णफूल और गले का हार) बनाकर बेचे जा रहे हैं। इन सामानों की बढ़ती मांग ग्रामीणों के लिए आमदनी का सशक्त जरिया भी बन रहा है।
चंपावत जिला चीड़ बाहुल्य है। 95 हजार हेक्टेयर में से 27292 हेक्टेयर पर चीड़ के जंगल हैं। चंपावत, लोहाघाट, काली कुमाऊं, देवीधुरा, भिंगराड़ा वन क्षेत्र में मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं। पिरूल (पाइन प्लस रुरल) संस्था ने लोहाघाट और खेतीखान क्षेत्र के कुछ गांवों में पिरूल को रोजगार से जोड़ा है। संस्था की सरयू पोहरकर बताती हैं कि वह ज्वलनशील चीड़ की पत्तियों के पिरूल से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बना रही हैं। इसके लिए स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षण के साथ ही प्रेरित भी किया जा रहा है।
पिरूल से टोकरी, बैग, पर्स, टोपी, टी कोस्टर, राखी से लेकर आभूषण (कर्णफूल और गले का हार) तक तैयार किए जा रहे हैं। जंगल से पिरूल एकत्र करने से लेकर बनाने तक का काम इन्हीं गांवों की 40 महिलाएं कर रही हैं। पिछले साल से इनउत्पादों की ऑनलाइन और सीधे बिक्री भी शुरू की गई है। डीएफओ आरसी कांडपाल कहते हैं कि पिरूल के उत्पाद बनाने से घर के काम के साथ उनकी नियमित आय भी हो रही है। साथ ही इससे पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल रही है। वन विभाग जायका योजना से इसमें सहयोग भी कर रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
चंपावत जिला चीड़ बाहुल्य है। 95 हजार हेक्टेयर में से 27292 हेक्टेयर पर चीड़ के जंगल हैं। चंपावत, लोहाघाट, काली कुमाऊं, देवीधुरा, भिंगराड़ा वन क्षेत्र में मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं। पिरूल (पाइन प्लस रुरल) संस्था ने लोहाघाट और खेतीखान क्षेत्र के कुछ गांवों में पिरूल को रोजगार से जोड़ा है। संस्था की सरयू पोहरकर बताती हैं कि वह ज्वलनशील चीड़ की पत्तियों के पिरूल से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बना रही हैं। इसके लिए स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षण के साथ ही प्रेरित भी किया जा रहा है।
विज्ञापन
पिरूल से टोकरी, बैग, पर्स, टोपी, टी कोस्टर, राखी से लेकर आभूषण (कर्णफूल और गले का हार) तक तैयार किए जा रहे हैं। जंगल से पिरूल एकत्र करने से लेकर बनाने तक का काम इन्हीं गांवों की 40 महिलाएं कर रही हैं। पिछले साल से इनउत्पादों की ऑनलाइन और सीधे बिक्री भी शुरू की गई है। डीएफओ आरसी कांडपाल कहते हैं कि पिरूल के उत्पाद बनाने से घर के काम के साथ उनकी नियमित आय भी हो रही है। साथ ही इससे पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल रही है। वन विभाग जायका योजना से इसमें सहयोग भी कर रहा है।
विज्ञापन