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कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है सुंई के मां भगवती के पुजारी को
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लोहाघाट के सुंई गांव का प्रसिद्घ भगवती मंदिर।
- फोटो : LOHAGHAT
लोहाघाट (चंपावत)। सुंई के प्रसिद्ध भगवती मंदिर के पुजारी को वर्षभर कड़ी तपस्या से गुजरना पड़ता है। वर्ष भर पुजारी को गृहस्थ जीवन का त्याग कर मंदिर में रहकर संन्यासी सा सादा जीवन बिताना पड़ता है।
कैसी भी विषम परिस्थिति हो पुजारी को प्रतिदिन नौले के ठंडे जल से स्नान करने के बाद मां भगवती की पूजा की जाती है। आषाढ़ी पूर्णिमा (रक्ष पुन्यू) के दिन मंदिर में पुजारियों की अदला बदली होती है।
मंदिर के पुजारी कैलाश चंद्र चौबे बताते हैं कि पुजारी को वर्षभर कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन मंदिर में पूजा का दायित्व ग्रहण करने के बाद पुजारी गृहस्थ जीवन त्याग कर एक वर्ष तक संन्यासी सा जीवन बिताना शुरू कर देता है।
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पुजारी को वर्षभर के लिए एक साथ नए कपड़े, बिस्तर आदि बनाने पड़ते हैं। वह पुराने वस्त्र और बिस्तर का प्रयोग नहीं करते हैं। इस दौरान पुजारी हर मौसम में सुबह चार बजे भगवती नौले के शीतल जल से स्नान करता है।
वर्ष भर नंगे पैर चलते हैं। वह बाल भी नहीं कटवाते हैं। सुबह-शाम दोनों वक्त स्वयं का बनाया सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। वर्ष में करीब छह माह अलग-अलग समय में उपवास करते हैं।
आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन होती है पुजारियों की अदला बदली
लोहाघाट (चंपावत)। पुजारी अमावस्या और संक्रांति के दिन पांच गांव सुंई में घर-घर जाकर दूध, अक्षत लाते हैं। इससे मां भगवती को भोग लगाने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं। रक्षाबंधन के दिन पांच गांव सुंई और 20 गांव बिशुंग से दूध, अक्षत लाते हैं।
आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन वायुरथ के पांच गांव सुंई और 20 गांव बिशुंग की परिक्रमा कर मंदिर में लौटने के बाद पुजारियों की अदला बदली होती है। अदला बदली के वक्त मंदिर की हर संपत्ति गिनकर नए पुजारी को हस्तांतरित की जाती है। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।
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कैसी भी विषम परिस्थिति हो पुजारी को प्रतिदिन नौले के ठंडे जल से स्नान करने के बाद मां भगवती की पूजा की जाती है। आषाढ़ी पूर्णिमा (रक्ष पुन्यू) के दिन मंदिर में पुजारियों की अदला बदली होती है।
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मंदिर के पुजारी कैलाश चंद्र चौबे बताते हैं कि पुजारी को वर्षभर कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन मंदिर में पूजा का दायित्व ग्रहण करने के बाद पुजारी गृहस्थ जीवन त्याग कर एक वर्ष तक संन्यासी सा जीवन बिताना शुरू कर देता है।
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पुजारी को वर्षभर के लिए एक साथ नए कपड़े, बिस्तर आदि बनाने पड़ते हैं। वह पुराने वस्त्र और बिस्तर का प्रयोग नहीं करते हैं। इस दौरान पुजारी हर मौसम में सुबह चार बजे भगवती नौले के शीतल जल से स्नान करता है।
वर्ष भर नंगे पैर चलते हैं। वह बाल भी नहीं कटवाते हैं। सुबह-शाम दोनों वक्त स्वयं का बनाया सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। वर्ष में करीब छह माह अलग-अलग समय में उपवास करते हैं।
आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन होती है पुजारियों की अदला बदली
लोहाघाट (चंपावत)। पुजारी अमावस्या और संक्रांति के दिन पांच गांव सुंई में घर-घर जाकर दूध, अक्षत लाते हैं। इससे मां भगवती को भोग लगाने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं। रक्षाबंधन के दिन पांच गांव सुंई और 20 गांव बिशुंग से दूध, अक्षत लाते हैं।
आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन वायुरथ के पांच गांव सुंई और 20 गांव बिशुंग की परिक्रमा कर मंदिर में लौटने के बाद पुजारियों की अदला बदली होती है। अदला बदली के वक्त मंदिर की हर संपत्ति गिनकर नए पुजारी को हस्तांतरित की जाती है। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।