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अपराजिताएं बोलीं-उन्हें भी दें तरजीह, पारिवारिक निर्णयों में भागीदारी बढ़ाएं
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नारी सम्मान की शपथ लेती एमडीएम एजुकेशनल एकेडमी स्कूल की छात्राएं व शिक्षिकाएं। संवाद
- फोटो : TANAKPUR
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टनकपुर (चंपावत)। ‘बेटों को दें संस्कार, महिलाओं का नहीं होगा तिरस्कार।’ यह बात अमर उजाला की ओर से अपराजिता के तहत ‘महिला अपराधों पर कैसे लगाम विषय पर हुए संवाद में महिलाओं ने एकसुर में कहीं। महिलाओं का कहना था कि बेटियों के प्रति नजरिया बदलने से समाज का भी नजरिया बदल जाएगा। महिलाओं ने घटते लिंगानुपात पर भी चिंता जताई।
शनिवार को एमडीएम एजुकेशनल एकेडमी स्कूल ककराली गेट पर हुए महिला संवाद में छात्राओं और शिक्षकों ने प्रतिभाग किया। छात्राओं ने कहा कि महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए उचित कदम उठाने के साथ ही उनकी पारिवारिक निर्णयों में भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। वक्ताओं ने कहा कि हम जिस तरह बेटियों को संस्कार देने की बात करते हैं अगर हम बचपन से बेटों को भी संस्कार दें और उन्हें बेटियों, महिलाओं का सम्मान करना सिखाएं तो बड़े होकर बेटे महिला अपराध के बारे में नहीं सोचेंगे।
प्रधानाचार्या सुनीता चंद ने छात्राओं और शिक्षिकाओं को नारी सम्मान और उन्हें समान अवसर देने की शपथ दिलाई। इस मौके पर शिक्षिका कमला बिष्ट, मेघा तिवारी, विधि पंत, आशा चंद, बबिता चंद, अनिता चौहान आदि ने भी बालिका अपराधों में कमी लाने, महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि बेटियों को भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
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अजन्मे शिशु की गर्भपात से हत्या एक गंभीर चुनौती है। समाज के साथ ही यह महिलाओं के स्वास्थ के लिए भी सही नहीं है। इसके प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है और उन्हें बताया जाए कि आज के समय में बेटी और बेटा एक समान हैं।
- गायत्री तिवारी, वरिष्ठ शिक्षिका।
महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराध और हिंसा कम नहीं हो रहे हैं। इसके लिए पुरुष प्रधान समाज को संवेदनशील बनाने की जरूरत है। बचपन से ही बेटों को बेटियों की तरह संस्कारित किया जाएगा तो निश्चित ही महिला अपराधों में कमी आएगी।
- रितु देउपा, शिक्षिका।
पुरुषवादी सोच रखने वालों को समझना चाहिए कि महिलाएं उपभोग की वस्तु नहीं हैं। एक ओर पुरुष नव दुर्गा में मां की पूजा करता है तो दूसरी ओर उनका रूप मानी जाने वाली महिलाओं पर अत्याचार करता है। पुरुषों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है।
कुसुमलता शर्मा, शिक्षिका
घटता लिंगानुपात चिंता का विषय है, कई राज्यों में तो यह राष्ट्रीय अनुपात से भी कम है। इसका कारण बेटियों की अपेक्षा बेटों को ज्यादा तरजीह दिया जाना है। अब समय बदल गया है और बेटियां हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही हैं।
- प्रिया मेहरा, छात्रा।
भ्रूण हत्या के लिए कई बार कुछ महिलाएं भी जिम्मेदार होती है। उन्हें भी अपनी सोच बदलनी होगी। अगर ऐसे ही भ्रूण हत्या होती रहेगी तो समाज में बालिकाओं की संख्या कम हो जाएगी और लड़कियों की खरीद-फरोख्त बढ़ जाएगी।
-सिमरन चंद, छात्रा।
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शनिवार को एमडीएम एजुकेशनल एकेडमी स्कूल ककराली गेट पर हुए महिला संवाद में छात्राओं और शिक्षकों ने प्रतिभाग किया। छात्राओं ने कहा कि महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए उचित कदम उठाने के साथ ही उनकी पारिवारिक निर्णयों में भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। वक्ताओं ने कहा कि हम जिस तरह बेटियों को संस्कार देने की बात करते हैं अगर हम बचपन से बेटों को भी संस्कार दें और उन्हें बेटियों, महिलाओं का सम्मान करना सिखाएं तो बड़े होकर बेटे महिला अपराध के बारे में नहीं सोचेंगे।
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प्रधानाचार्या सुनीता चंद ने छात्राओं और शिक्षिकाओं को नारी सम्मान और उन्हें समान अवसर देने की शपथ दिलाई। इस मौके पर शिक्षिका कमला बिष्ट, मेघा तिवारी, विधि पंत, आशा चंद, बबिता चंद, अनिता चौहान आदि ने भी बालिका अपराधों में कमी लाने, महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि बेटियों को भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
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अजन्मे शिशु की गर्भपात से हत्या एक गंभीर चुनौती है। समाज के साथ ही यह महिलाओं के स्वास्थ के लिए भी सही नहीं है। इसके प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है और उन्हें बताया जाए कि आज के समय में बेटी और बेटा एक समान हैं।
- गायत्री तिवारी, वरिष्ठ शिक्षिका।
महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराध और हिंसा कम नहीं हो रहे हैं। इसके लिए पुरुष प्रधान समाज को संवेदनशील बनाने की जरूरत है। बचपन से ही बेटों को बेटियों की तरह संस्कारित किया जाएगा तो निश्चित ही महिला अपराधों में कमी आएगी।
- रितु देउपा, शिक्षिका।
पुरुषवादी सोच रखने वालों को समझना चाहिए कि महिलाएं उपभोग की वस्तु नहीं हैं। एक ओर पुरुष नव दुर्गा में मां की पूजा करता है तो दूसरी ओर उनका रूप मानी जाने वाली महिलाओं पर अत्याचार करता है। पुरुषों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है।
कुसुमलता शर्मा, शिक्षिका
घटता लिंगानुपात चिंता का विषय है, कई राज्यों में तो यह राष्ट्रीय अनुपात से भी कम है। इसका कारण बेटियों की अपेक्षा बेटों को ज्यादा तरजीह दिया जाना है। अब समय बदल गया है और बेटियां हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही हैं।
- प्रिया मेहरा, छात्रा।
भ्रूण हत्या के लिए कई बार कुछ महिलाएं भी जिम्मेदार होती है। उन्हें भी अपनी सोच बदलनी होगी। अगर ऐसे ही भ्रूण हत्या होती रहेगी तो समाज में बालिकाओं की संख्या कम हो जाएगी और लड़कियों की खरीद-फरोख्त बढ़ जाएगी।
-सिमरन चंद, छात्रा।