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बनबसा के पहलवान नवल ने लिया सन्यास
Updated Tue, 04 Dec 2018 12:20 AM IST
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बनबसा (चंपावत)। यहां आयोजित दंगल में बनबसा के पहलवान नवल किशोर ने बरेली के बल्लू पहलवान को परास्त करने के बाद कुश्ती से सन्यास लेने की घोषणा की। अब वे अपने पुत्र बिट्टू पहलवान के अलावा पांच अन्य क्षेत्रीय युवकों को दंगलों के लिए तैयार कर रहे हैं।
बनबसा सेना छावनी के सैनिक (आर्मी सिविलियन) कर्मी नवल किशोर (50) को मां आशा देवी ने मेहनत मजदूरी कर अपने पुत्र को पहलवानी सिखाई। नवल किशोर बताते हैं कि वे अपने खुराक के लिए मजदूरी करते थे। राज मिस्त्रियों के साथ गारा बनाने का काम कर कुछ पैसे कमा लेते थे। आठवीं तक पढ़े नवल ने पहला दंगल 1988 में लड़ा था, जिसके बाद उन्होंने यूपी, पंजाब आदि राज्यों में कई मुकाबलों में प्रतिभाग किया।
बरेली, पीलीभीत, लखीमपुर, बदायूं, शाहजहांनपुर के दंगलों से पहलवान के रूप में पहचान बनाई। वर्ष 1995 में वे आर्मी सिविलियन के रूप में भर्ती हुए तब से बनबसा सैनिक छावनी में कार्यरत हैं। सेना छावनी में ही उन्होंने अखाड़ा बनाया और नियमित दो घंटे अभ्यास किया। टनकपुर राजकीय महाविद्यालय से बी काम कर रहा उनका पुत्र अभिजीत उर्फ बिट्टू भी अपने पिता से ही कुश्ती के दांव पेंच सीख रहा है। नवल किशोर युवा पीढ़ी में बढ़ते नशे की प्रवृत्ति और भटकाव से बेहद आहत हैं। वे कहते हैं कि उन्हें समाज और समाजसेवियों का सहयोग मिले तो वे एक कुश्ती एकेडमी बना युवाओं को पहलवान बनाने का बीड़ा उठाने को तैयार हैं।
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बनबसा सेना छावनी के सैनिक (आर्मी सिविलियन) कर्मी नवल किशोर (50) को मां आशा देवी ने मेहनत मजदूरी कर अपने पुत्र को पहलवानी सिखाई। नवल किशोर बताते हैं कि वे अपने खुराक के लिए मजदूरी करते थे। राज मिस्त्रियों के साथ गारा बनाने का काम कर कुछ पैसे कमा लेते थे। आठवीं तक पढ़े नवल ने पहला दंगल 1988 में लड़ा था, जिसके बाद उन्होंने यूपी, पंजाब आदि राज्यों में कई मुकाबलों में प्रतिभाग किया।
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बरेली, पीलीभीत, लखीमपुर, बदायूं, शाहजहांनपुर के दंगलों से पहलवान के रूप में पहचान बनाई। वर्ष 1995 में वे आर्मी सिविलियन के रूप में भर्ती हुए तब से बनबसा सैनिक छावनी में कार्यरत हैं। सेना छावनी में ही उन्होंने अखाड़ा बनाया और नियमित दो घंटे अभ्यास किया। टनकपुर राजकीय महाविद्यालय से बी काम कर रहा उनका पुत्र अभिजीत उर्फ बिट्टू भी अपने पिता से ही कुश्ती के दांव पेंच सीख रहा है। नवल किशोर युवा पीढ़ी में बढ़ते नशे की प्रवृत्ति और भटकाव से बेहद आहत हैं। वे कहते हैं कि उन्हें समाज और समाजसेवियों का सहयोग मिले तो वे एक कुश्ती एकेडमी बना युवाओं को पहलवान बनाने का बीड़ा उठाने को तैयार हैं।
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