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ठेके में ही खर्च हो गई स्थाई निर्माण से ज्यादा रकम
Updated Thu, 15 Feb 2018 11:21 PM IST
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चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम मेले की सरकारी अवधि में बनने वाले अस्थाई निर्माण के ठेके में अब तक इतनी रकम खर्च हो चुकी है, कि उससे कम धन में स्थायी निर्माण हो जाता। हर साल अस्थाई निर्माण पर होने वाले खर्च की राशि 25 लाख रुपये से अधिक में होती है। इसके चलते जिला पंचायत को काफी मोटी रकम हर साल इस अस्थाई निर्माण में लगानी पड़ती है।
मां पूर्णागिरि देवी के दर्शन के लिए बरसात को छोड़ साल भर श्रद्धालु पहुंचते हैं। मगर धाम में श्रद्धालुओं का सैलाब मुख्य रूप से होली के तुरंत बाद शुरू होने वाले सरकारी अवधि में उमड़ता है। करीब तीन महीने तक चलने वाले मेले में पिछले वर्ष तक सालाना 20 लाख से अधिक तीर्थयात्री उमड़ते हैं। जिला पंचायत संचालित मेले की इस अवधि के लिए जिला पंचायत, मेला मजिस्ट्रेट कार्यालय, सफाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, यात्रियों की सुरक्षा सहित तमाम जरूरी व्यवस्था की जाती है। इसके लिए जिला पंचायत ऐसे तमाम विभागों के लिए आवासीय व्यवस्था के अंतर्गत अस्थाई टिन शेड बनाती है। करीब 21 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में इन शेड का निर्माण अस्थाई रूप से ठेके के जरिए किया जाता है। जिसमें अमूमन 25 लाख रुपये से अधिक खर्च होते हैं। महज बीते सात वर्षों में ही इस अस्थाई निर्माण में 1.66 करोड़ रुपये खर्च हो चुका है। जबकि राज्य बनने से अब तक के 18 वर्षों में यह रकम इससे दोगुनी से भी ज्यादा है।
सात वर्ष में आवासीय टिन शेड में हुआ व्यय
वर्ष खर्च (लाख रुपये में)
2011 12.79
2012 15.80
2013 23.21
2014 34.60
2015 24.82
2016 24.35
2017 31.20
कुल खर्च 166.79
कोट
मां पूर्णागिरि धाम का मेला क्षेत्र मुख्य रूप से आरक्षित वन क्षेत्र के दायरे में आता है। आरक्षित वन क्षेत्र होने की वजह से स्थायी निर्माण मुमकिन नहीं है। इस कारण अस्थाई निर्माण कराया जाता है। जिला पंचायत ने पूर्व में मेला क्षेत्र में लीज की जमीन के लिए आवेदन किया था। अलबत्ता अभी इस पर भी कोई निर्णय नहीं हो सका है।
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-राजेश कुमार, अपर मुख्य अधिकारी, जिला पंचायत, चंपावत।
कोट
आरक्षित वन क्षेत्र में किसी भी तरह का गैर वानिकी कार्य करना प्रतिबंधित है। इसके चलते मां पूर्णागिरि धाम मेला क्षेत्र के आरक्षित वन क्षेत्र में निर्माण कराया जाना वर्जित है। -कुबेर सिंह बिष्ट, प्रभागीय वनाधिकारी, चंपावत।
मां पूर्णागिरि देवी के दर्शन के लिए बरसात को छोड़ साल भर श्रद्धालु पहुंचते हैं। मगर धाम में श्रद्धालुओं का सैलाब मुख्य रूप से होली के तुरंत बाद शुरू होने वाले सरकारी अवधि में उमड़ता है। करीब तीन महीने तक चलने वाले मेले में पिछले वर्ष तक सालाना 20 लाख से अधिक तीर्थयात्री उमड़ते हैं। जिला पंचायत संचालित मेले की इस अवधि के लिए जिला पंचायत, मेला मजिस्ट्रेट कार्यालय, सफाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, यात्रियों की सुरक्षा सहित तमाम जरूरी व्यवस्था की जाती है। इसके लिए जिला पंचायत ऐसे तमाम विभागों के लिए आवासीय व्यवस्था के अंतर्गत अस्थाई टिन शेड बनाती है। करीब 21 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में इन शेड का निर्माण अस्थाई रूप से ठेके के जरिए किया जाता है। जिसमें अमूमन 25 लाख रुपये से अधिक खर्च होते हैं। महज बीते सात वर्षों में ही इस अस्थाई निर्माण में 1.66 करोड़ रुपये खर्च हो चुका है। जबकि राज्य बनने से अब तक के 18 वर्षों में यह रकम इससे दोगुनी से भी ज्यादा है।
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सात वर्ष में आवासीय टिन शेड में हुआ व्यय
वर्ष खर्च (लाख रुपये में)
2011 12.79
2012 15.80
2013 23.21
2014 34.60
2015 24.82
2016 24.35
2017 31.20
कुल खर्च 166.79
कोट
मां पूर्णागिरि धाम का मेला क्षेत्र मुख्य रूप से आरक्षित वन क्षेत्र के दायरे में आता है। आरक्षित वन क्षेत्र होने की वजह से स्थायी निर्माण मुमकिन नहीं है। इस कारण अस्थाई निर्माण कराया जाता है। जिला पंचायत ने पूर्व में मेला क्षेत्र में लीज की जमीन के लिए आवेदन किया था। अलबत्ता अभी इस पर भी कोई निर्णय नहीं हो सका है।
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-राजेश कुमार, अपर मुख्य अधिकारी, जिला पंचायत, चंपावत।
कोट
आरक्षित वन क्षेत्र में किसी भी तरह का गैर वानिकी कार्य करना प्रतिबंधित है। इसके चलते मां पूर्णागिरि धाम मेला क्षेत्र के आरक्षित वन क्षेत्र में निर्माण कराया जाना वर्जित है। -कुबेर सिंह बिष्ट, प्रभागीय वनाधिकारी, चंपावत।