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जड़ी-बूटियों के प्रचार-प्रसार में जुटे बुजुर्ग वैद्य
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चंपावत। जिले में जड़ी-बूटियों के जानकार पल्सों निवासी वैद्य पंडित लीलाधर जोशी आज भी जड़ी-बूटियों के माध्यम से रोगियों का निशुल्क उपचार कर रहे हैं। साथ ही जड़ी-बूटियों के उत्पादन के लिए लोगों को प्रेरित भी कर रहे हैं। उम्र के आखिरी पड़ाव में चल रहे पंडित जोशी ने पल्सों गांव में अपनी 30 नाली भूमि पर बिना किसी सरकारी मदद के औषधीय महत्व की जड़ी-बूटियों की नर्सरी भी विकसित की है।
वैद्य लीलाधर जोशी ने भारतीय पुरातन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को जीवित रखते हुए पल्सों में ग्राम वैद्यशाला केंद्र का भी निर्माण किया है। यहां वह हर माह शिविर लगाकर रोगियों को जड़ी-बूटियां बांटते हैं। उन्होंने परंपरागत खेती-किसानी छोड़कर 30 नाली भूमि पर जड़ी-बूटियों की नर्सरी विकसित की है।
इसके अलावा वे आम की छाल, गोमूत्र शोधित आंवला, जामुन की छाल, बुरांश और काफल की छाल आदि के माध्यम से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, अल्सर, दमा, सांस, खांसी, पथरी, पेशाब की जलन, ल्यूकोरिया, दांत दर्द, माइग्रेन सहित विभिन्न रोगों का निशुल्क इलाज करते हैं। लीलाधर करीब 30 वर्षों से इस कार्य में लगे हैं। उनके परिजनों को भी जड़ी-बूटियों के बारे में अच्छी खासी जानकारी है।
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300 से अधिक प्रजातियों की जड़ी-बूटियां उगाईं
चंपावत। पंडित जोशी ने अपनी नर्सरी में अश्वगंधा, पाषाणभेद, ममीरा, चिरायता, दालचीनी, गनिया, हंसराज, राजवृक्ष, केवला, कालाबांस, रीठा, इंद्रायणी, समेवा, सर्पगंधा, दारु हल्दी, रैचीजीवन, मंजीस्ठा, दाड़िम, सतावर, धृतकुमारी, गुलाब कांठी, हरड़, तिमूर, वन तुलसी, काला जीरा, गुलबनस्पा, राम तुलसी, अजवाइन, पीपरमैंट, लहसुनिया, सौंफ, बड़ी इलायची, हिमालयन वाईन, कोपराघास, कोयलस, आंवला, पुदीना, ब्राह्मी सहित 300 से अधिक प्रजातियों की जड़ी-बूटियों को उगाया है।
शासन-प्रशासन से नहीं मिली मदद
चंपावत। स्वयं के प्रयासों से जड़ी बूटी की खेती को बढ़ावा देने के कार्य में जुटे पंडित लीलाधर जोशी को आज तक सरकारी मदद नहीं मिली। हालांकि भेषज संघ उन्हें गोष्ठियों और कार्यशालाओं में व्याख्यान देने के लिए बुलाता है। उन्होंने अपने प्रयासों से ही जड़ी बूटियों को बढ़ावा दिया है।
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वैद्य लीलाधर जोशी ने भारतीय पुरातन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को जीवित रखते हुए पल्सों में ग्राम वैद्यशाला केंद्र का भी निर्माण किया है। यहां वह हर माह शिविर लगाकर रोगियों को जड़ी-बूटियां बांटते हैं। उन्होंने परंपरागत खेती-किसानी छोड़कर 30 नाली भूमि पर जड़ी-बूटियों की नर्सरी विकसित की है।
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इसके अलावा वे आम की छाल, गोमूत्र शोधित आंवला, जामुन की छाल, बुरांश और काफल की छाल आदि के माध्यम से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, अल्सर, दमा, सांस, खांसी, पथरी, पेशाब की जलन, ल्यूकोरिया, दांत दर्द, माइग्रेन सहित विभिन्न रोगों का निशुल्क इलाज करते हैं। लीलाधर करीब 30 वर्षों से इस कार्य में लगे हैं। उनके परिजनों को भी जड़ी-बूटियों के बारे में अच्छी खासी जानकारी है।
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300 से अधिक प्रजातियों की जड़ी-बूटियां उगाईं
चंपावत। पंडित जोशी ने अपनी नर्सरी में अश्वगंधा, पाषाणभेद, ममीरा, चिरायता, दालचीनी, गनिया, हंसराज, राजवृक्ष, केवला, कालाबांस, रीठा, इंद्रायणी, समेवा, सर्पगंधा, दारु हल्दी, रैचीजीवन, मंजीस्ठा, दाड़िम, सतावर, धृतकुमारी, गुलाब कांठी, हरड़, तिमूर, वन तुलसी, काला जीरा, गुलबनस्पा, राम तुलसी, अजवाइन, पीपरमैंट, लहसुनिया, सौंफ, बड़ी इलायची, हिमालयन वाईन, कोपराघास, कोयलस, आंवला, पुदीना, ब्राह्मी सहित 300 से अधिक प्रजातियों की जड़ी-बूटियों को उगाया है।
शासन-प्रशासन से नहीं मिली मदद
चंपावत। स्वयं के प्रयासों से जड़ी बूटी की खेती को बढ़ावा देने के कार्य में जुटे पंडित लीलाधर जोशी को आज तक सरकारी मदद नहीं मिली। हालांकि भेषज संघ उन्हें गोष्ठियों और कार्यशालाओं में व्याख्यान देने के लिए बुलाता है। उन्होंने अपने प्रयासों से ही जड़ी बूटियों को बढ़ावा दिया है।