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फसल उत्पादन बढ़ाने में कारगार सबित हो रहा ढेंचा
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फसल उत्पादन बढ़ाने में कारगार साबित हो रहा ढेंचा
बमनपुरी के प्रगतिशील किसान पिछले पांच वर्षों से ले रहे हैं धान और गेहूं की डेढ़ गुनी पैदावार
रासायनिक खाद और कीटनाशक का भी किया जा रहा कम से कम प्रयोग
- विनोद काला
बनबसा (चंपावत)। बनबसा के बमनपुरी गांव के प्रगतिशील किसान ढेंचे की बुआई कर धान और गेहूं की डेढ़ गुनी पैदावार ले रहे हैं। इसी के साथ ही फसल तैयार करने में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का भी कम से कम उपयोग किया जा रहा है। इस तरह का हर्बल कृषि उत्पाद स्वास्थ्य के लिए भी खासा लाभदायक बताया जा रहा है।
बमनपुरी निवासी प्रगतिशील किसान हेमेंद्र सिंह रावत पिछले पांच वर्षों से अपनी तीन एकड़ भूमि पर ढेंचा बो रहे हैं। उन्होंने बताया कि मध्य मई से मध्य जून तक ढेंचा बोने के बाद उसे मिट्टी में दबा दिया जाता है। जिसके बाद धान की रोपाई की जाती है। ढेंचा मिट्टी में मिलकर खाद का काम कर भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाता है। उन्होंने बताया कि धान की फसल की कटाई के बाद गेहूं की फसल को भी इसका लाभ मिलता है। ढेंचे को वर्ष में एक बार ही धान की फसल से पूर्व बोया जाता है। उन्होंने बताया कि पिछले पांच वर्षों में उनके खेतों में रासायनिक खादों का कम से कम प्रयोग किया गया है। धान और गेहूं की फसल अब पूर्व की अपेक्षा डेढ़ गुनी बढ़ी है। बताया गया कि ढेंचे के बोने से खेतों में घास भी कम उगती है। वे क्षेत्र के ग्रामीणों को धान की फसल की बुआई से पहले ढेंचे को बोने की सलाह दे रहे हैं।
फोटो 30 टीएनपीबीएनबी 02 पी।
इनसेट:-
धान, गेहूं या फली वाली फसलों की जड़ों में बनने वाली गांठों में पनपने वाला बैक्टीरिया वातावरण की नाइट्रोजन को नष्ट करता है जिसके बचाव को ढेंचा लगाना कारगर होता है। ढेंचा लगाने से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और फसलों को नाइट्रोजन एवं अन्य आर्गेनिक पदार्थ भी प्राप्त होते हैं। इससे रासायनिक खाद आदि का उपयोग भी काफी कम हो जाता है।
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- डॉ. पुष्पेंद्र सिंह, कृषि वैज्ञानिक पंतनगर (कार्यरत- सबाना शीड्स दिल्ली)
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बमनपुरी के प्रगतिशील किसान पिछले पांच वर्षों से ले रहे हैं धान और गेहूं की डेढ़ गुनी पैदावार
रासायनिक खाद और कीटनाशक का भी किया जा रहा कम से कम प्रयोग
- विनोद काला
बनबसा (चंपावत)। बनबसा के बमनपुरी गांव के प्रगतिशील किसान ढेंचे की बुआई कर धान और गेहूं की डेढ़ गुनी पैदावार ले रहे हैं। इसी के साथ ही फसल तैयार करने में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का भी कम से कम उपयोग किया जा रहा है। इस तरह का हर्बल कृषि उत्पाद स्वास्थ्य के लिए भी खासा लाभदायक बताया जा रहा है।
बमनपुरी निवासी प्रगतिशील किसान हेमेंद्र सिंह रावत पिछले पांच वर्षों से अपनी तीन एकड़ भूमि पर ढेंचा बो रहे हैं। उन्होंने बताया कि मध्य मई से मध्य जून तक ढेंचा बोने के बाद उसे मिट्टी में दबा दिया जाता है। जिसके बाद धान की रोपाई की जाती है। ढेंचा मिट्टी में मिलकर खाद का काम कर भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाता है। उन्होंने बताया कि धान की फसल की कटाई के बाद गेहूं की फसल को भी इसका लाभ मिलता है। ढेंचे को वर्ष में एक बार ही धान की फसल से पूर्व बोया जाता है। उन्होंने बताया कि पिछले पांच वर्षों में उनके खेतों में रासायनिक खादों का कम से कम प्रयोग किया गया है। धान और गेहूं की फसल अब पूर्व की अपेक्षा डेढ़ गुनी बढ़ी है। बताया गया कि ढेंचे के बोने से खेतों में घास भी कम उगती है। वे क्षेत्र के ग्रामीणों को धान की फसल की बुआई से पहले ढेंचे को बोने की सलाह दे रहे हैं।
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फोटो 30 टीएनपीबीएनबी 02 पी।
इनसेट:-
धान, गेहूं या फली वाली फसलों की जड़ों में बनने वाली गांठों में पनपने वाला बैक्टीरिया वातावरण की नाइट्रोजन को नष्ट करता है जिसके बचाव को ढेंचा लगाना कारगर होता है। ढेंचा लगाने से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और फसलों को नाइट्रोजन एवं अन्य आर्गेनिक पदार्थ भी प्राप्त होते हैं। इससे रासायनिक खाद आदि का उपयोग भी काफी कम हो जाता है।
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- डॉ. पुष्पेंद्र सिंह, कृषि वैज्ञानिक पंतनगर (कार्यरत- सबाना शीड्स दिल्ली)