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फर्जी प्रमाण पत्र मामले में पौड़ी जिले के 22 शिक्षकों को राहत
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चंपावत। पौड़ी जिले में तैनात 22 सहायक अध्यापकों के नियुक्ति के दौरान फर्जी प्रमाण पत्र लगाए जाने के मामले में आरोपी शिक्षकों को जिला एवं सत्र न्यायालय से राहत मिली है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश आशीष नैथानी ने इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की ओर से पूर्व में दिए गए फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है।
गौरतलब है कि वर्ष 1998 में पौड़ी जिले में हुई शिक्षकों की भर्ती में 22 शिक्षकों पर फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने का मामला सामने आया था। मामले के प्रकाश में आने के बाद आरोपियों को निलंबित करते हुए उनके खिलाफ पौड़ी जिले में आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया था जिस पर आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाइकोर्ट के निर्देश पर इस मामले को पौड़ी जिले से हस्तांतरित कर चंपावत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंपा गया था। मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने वर्ष 2013 में आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोष मुक्त किया था लेकिन राज्य सरकार की ओर से जिला जज के न्यायालय में इसके खिलाफ अपील दायर की थी। मामले में दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलीलों, गवाहों के बयान और पत्रावली साक्ष्यों के अध्ययन के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखते हुए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है।
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डायट की चूक का मिला शिक्षकों को लाभ
चंपावत। फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर शिक्षक बनने के मामले में साक्ष्य नहीं मिलने के चलते पौड़ी जिले के आरोपी 22 शिक्षकों को बड़ी राहत मिली है। इस मामले में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) की ओर से प्रमाणपत्र की मूल कॉपी साक्ष्य के रूप में पेश नहीं की गई बल्कि ये दस्तावेज फोटो कॉपी को सत्यापित करके पेश किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस रैंसवाल का कहना है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम में मूल प्रमाणपत्रों को पेश किया जाना जरूरी है। पौड़ी की डायट के अधिकारियों द्वारा मूल कॉपी को पेश नहीं किए जाने का लाभ आरोपी शिक्षकों को मिला जिस कारण उन पर दोष साबित नहीं किया जा सका।
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गौरतलब है कि वर्ष 1998 में पौड़ी जिले में हुई शिक्षकों की भर्ती में 22 शिक्षकों पर फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने का मामला सामने आया था। मामले के प्रकाश में आने के बाद आरोपियों को निलंबित करते हुए उनके खिलाफ पौड़ी जिले में आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया था जिस पर आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
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हाइकोर्ट के निर्देश पर इस मामले को पौड़ी जिले से हस्तांतरित कर चंपावत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंपा गया था। मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने वर्ष 2013 में आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोष मुक्त किया था लेकिन राज्य सरकार की ओर से जिला जज के न्यायालय में इसके खिलाफ अपील दायर की थी। मामले में दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलीलों, गवाहों के बयान और पत्रावली साक्ष्यों के अध्ययन के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखते हुए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है।
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डायट की चूक का मिला शिक्षकों को लाभ
चंपावत। फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर शिक्षक बनने के मामले में साक्ष्य नहीं मिलने के चलते पौड़ी जिले के आरोपी 22 शिक्षकों को बड़ी राहत मिली है। इस मामले में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) की ओर से प्रमाणपत्र की मूल कॉपी साक्ष्य के रूप में पेश नहीं की गई बल्कि ये दस्तावेज फोटो कॉपी को सत्यापित करके पेश किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस रैंसवाल का कहना है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम में मूल प्रमाणपत्रों को पेश किया जाना जरूरी है। पौड़ी की डायट के अधिकारियों द्वारा मूल कॉपी को पेश नहीं किए जाने का लाभ आरोपी शिक्षकों को मिला जिस कारण उन पर दोष साबित नहीं किया जा सका।