{"_id":"5a92ec5d4f1c1bf17b8b956f","slug":"101519578205-champawat-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"इस्तीफा वापस, अब छुट्टी पर जाएंगे एडीएम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
इस्तीफा वापस, अब छुट्टी पर जाएंगे एडीएम
Updated Sun, 25 Feb 2018 10:37 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चंपावत। चंपावत के अपर जिलाधिकारी (एडीएम) हेमंत कुमार वर्मा के इस्तीफे का प्रकरण जिलाधिकारी और मंडलायुक्त के हस्तक्षेप के बाद रविवार को सुलझ गया है। एडीएम ने चुनिंदा प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात करने के अलावा किसी से न मुलाकात की और न मोबाइल फोन पर बात की। अलबत्ता डीएम डॉ.अहमद इकबाल ने एडीएम के इस्तीफा वापस लेने की पुष्टि की है। कहा है कि स्वास्थ्य में सुधार होने तक एडीएम अवकाश पर रहेंगे।
एडीएम वर्मा ने शनिवार अपरान्ह में सतत विकास पर्व के काम में कुछ संगठनों द्वारा दबाव डालने और तनाव के चलते जिलाधिकारी को तीन पेज का पत्र भेजकर इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफे के साथ ही उन्होंने सरकारी कार को भी नाजरात में जमा करा दिया था। इस पूरे वाकये की भनक लगने से चंपावत से देहरादून तक की प्रशासनिक मशीनरी सकते में आ गई थी। शनिवार रात करीब आठ बजे तक दो दिन तक चलने वाले सतत विकास का समापन कार्यक्रम हुआ। इसके बाद ही डीएम को पत्र की जानकारी हुई।
रविवार सुबह डीएम डॉ.इकबाल ने एडीएम वर्मा से मुलाकात कर उनका स्वास्थ्य जाना। लोहाघाट के एक डॉक्टर ने आवास पर ही उनका स्वास्थ्य परीक्षण किया। इस दौरान डीएम ने उनसे त्यागपत्र के मसले पर बात की। जिलाधिकारी के अलावा कुमाऊं के मंडलायुक्त चंद्रशेखर भट्ट ने भी उन्हें समझाया।
विज्ञापन
जिलाधिकारी ने बताया कि काम की व्यस्तता से उपजे मानसिक एवं शारीरिक तनाव के चलते उन्होंने यह कदम उठाया। डीएम से हुई वार्ता के बाद एडीएम इस्तीफा वापस लेने को राजी हुए। डीएम ने बताया कि स्वास्थ्य में सुधार होने तक एडीएम वर्मा को अवकाश पर जाने की इजाजत होगी। अलबत्ता वह छुट्टी में कब से जाएंगे, अभी यह साफ नहीं है। वहीं, रविवार को भी एडीएम ने चुनिंदा अधिकारियों को छोड़ न किसी से मुलाकात की और नहीं बात की। साथ ही उनका मोबाइल फोन भी बंद रहा।
आम तौर पर स्वीकार नहीं होता सशर्त इस्तीफा
किसी अधिकारी-कर्मचारी का सशर्त इस्तीफा आम तौर पर स्वीकार नहीं होता है। इस तरह के इस्तीफे पर डीएम की आख्या भी खासी महत्व रखती है। प्रक्रिया के तहत जिलाधिकारी त्यागपत्र को अपनी आख्या के साथ प्रमुख सचिव कार्मिक को भेजते हैं।
सिर्फ आवेश में नहीं फूटा इस्तीफा बम!
चंपावत। सियासत में इस्तीफे का अक्सर हथियार के रूप में उपयोग किया जाता है, लेकिन अगर कोई अधिकारी इस्तीफा देता है, तो मामला यकीनन गंभीर हो जाता है। सेवा नियमावली से लेकर कई तरह की मर्यादाओं का बंधन अफसर के साथ होता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर अपर जिलाधिकारी (एडीएम) हेमंत कुमार वर्मा इस्तीफे की चिट्ठी लिखने को मजबूर क्यों हुए? ये सिर्फ जोश या किसी तरह की जल्दबाजी का कदम नहीं था, बल्कि उन पर पड़ रहे गहरे दबाव रहे होंगे। इस तरह के कुछ संकेत तीन पेज के इस्तीफे के पत्र से भी मिलते हैं।
दरअसल जिला प्रशासन और डायस फाउंडेशन की संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईएसएसडी) के तत्वावधान में 23 फरवरी से दो दिन तक चले सतत विकास कार्यक्रम की बीते कुछ समय से चल रही तैयारियों का काफी दारोमदार यहां की सरकारी मशीनरी पर था। जिलाधिकारी के अवकाश में होने पर जिम्मेदारियों का भार प्रशासनिक मुखिया होने के चलते एडीएम के कंधे पर आ गया।
7 फरवरी को एनएच पर स्वांला जीप हादसे और कुछ अन्य घटनाओं ने भी हालात को असामान्य बना दिया। बताते हैं कि संस्था के कुछ लोग कतिपय अधिकारियों पर विभिन्न व्यवस्थाओं को लेकर दबाव भी बना रहे थे। इन कई कारणों से पहले से स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रहे अपर जिलाधिकारी को मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा। सूत्र बताते हैं कि जिले के पांच विभागों के अधिकारी भी कतिपय संस्थाओं की भूमिका को लेकर नाराज चल रहे थे।
सतत विकास कार्यक्रम से जुड़े विभागों को अपने रोजमर्रा के काम के साथ वक्त-बेवक्त अनावश्यक दबावों को भी झेलना पड़ रहा था। दबी-जुबान में चर्चा करने के अलावा इन अधिकारियों ने सार्वजनिक तौर पर कभी कुछ कहा नहीं, मगर अब यह अफसर भी एडीएम के इस्तीफे की चिट्ठी को इसी गहरे दबाव की परिणति मान रहे हैं।
क्या किसी पर कार्रवाई होगी?
सतत विकास कार्यक्रम का भविष्य क्या होगा?, इससे जिले के लोगों को कितना लाभ होगा? ऐसे सवालों का जवाब तो आने वाले वक्त में मिलेगा, मगर प्रशासनिक तौर पर इतनी बड़ी किरकिरी करने वालों के क्रियाकलापों की जांच और उन पर कोई कार्रवाई होगी, इसे लेकर फिलहाल संशय है। अलबत्ता जिलाधिकारी ने परोक्ष में इसके संकेत तो दिए हैं। वहीं आयोजक संस्था के प्रतिनिधि किसी तरह के दबाव के आरोपों को नकारते हुए विभागीय अधिकारियों को किसी तरह आहत करने से इनकार कर रहे हैं।
विज्ञापन
एडीएम वर्मा ने शनिवार अपरान्ह में सतत विकास पर्व के काम में कुछ संगठनों द्वारा दबाव डालने और तनाव के चलते जिलाधिकारी को तीन पेज का पत्र भेजकर इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफे के साथ ही उन्होंने सरकारी कार को भी नाजरात में जमा करा दिया था। इस पूरे वाकये की भनक लगने से चंपावत से देहरादून तक की प्रशासनिक मशीनरी सकते में आ गई थी। शनिवार रात करीब आठ बजे तक दो दिन तक चलने वाले सतत विकास का समापन कार्यक्रम हुआ। इसके बाद ही डीएम को पत्र की जानकारी हुई।
विज्ञापन
रविवार सुबह डीएम डॉ.इकबाल ने एडीएम वर्मा से मुलाकात कर उनका स्वास्थ्य जाना। लोहाघाट के एक डॉक्टर ने आवास पर ही उनका स्वास्थ्य परीक्षण किया। इस दौरान डीएम ने उनसे त्यागपत्र के मसले पर बात की। जिलाधिकारी के अलावा कुमाऊं के मंडलायुक्त चंद्रशेखर भट्ट ने भी उन्हें समझाया।
विज्ञापन
जिलाधिकारी ने बताया कि काम की व्यस्तता से उपजे मानसिक एवं शारीरिक तनाव के चलते उन्होंने यह कदम उठाया। डीएम से हुई वार्ता के बाद एडीएम इस्तीफा वापस लेने को राजी हुए। डीएम ने बताया कि स्वास्थ्य में सुधार होने तक एडीएम वर्मा को अवकाश पर जाने की इजाजत होगी। अलबत्ता वह छुट्टी में कब से जाएंगे, अभी यह साफ नहीं है। वहीं, रविवार को भी एडीएम ने चुनिंदा अधिकारियों को छोड़ न किसी से मुलाकात की और नहीं बात की। साथ ही उनका मोबाइल फोन भी बंद रहा।
आम तौर पर स्वीकार नहीं होता सशर्त इस्तीफा
किसी अधिकारी-कर्मचारी का सशर्त इस्तीफा आम तौर पर स्वीकार नहीं होता है। इस तरह के इस्तीफे पर डीएम की आख्या भी खासी महत्व रखती है। प्रक्रिया के तहत जिलाधिकारी त्यागपत्र को अपनी आख्या के साथ प्रमुख सचिव कार्मिक को भेजते हैं।
सिर्फ आवेश में नहीं फूटा इस्तीफा बम!
चंपावत। सियासत में इस्तीफे का अक्सर हथियार के रूप में उपयोग किया जाता है, लेकिन अगर कोई अधिकारी इस्तीफा देता है, तो मामला यकीनन गंभीर हो जाता है। सेवा नियमावली से लेकर कई तरह की मर्यादाओं का बंधन अफसर के साथ होता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर अपर जिलाधिकारी (एडीएम) हेमंत कुमार वर्मा इस्तीफे की चिट्ठी लिखने को मजबूर क्यों हुए? ये सिर्फ जोश या किसी तरह की जल्दबाजी का कदम नहीं था, बल्कि उन पर पड़ रहे गहरे दबाव रहे होंगे। इस तरह के कुछ संकेत तीन पेज के इस्तीफे के पत्र से भी मिलते हैं।
दरअसल जिला प्रशासन और डायस फाउंडेशन की संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईएसएसडी) के तत्वावधान में 23 फरवरी से दो दिन तक चले सतत विकास कार्यक्रम की बीते कुछ समय से चल रही तैयारियों का काफी दारोमदार यहां की सरकारी मशीनरी पर था। जिलाधिकारी के अवकाश में होने पर जिम्मेदारियों का भार प्रशासनिक मुखिया होने के चलते एडीएम के कंधे पर आ गया।
7 फरवरी को एनएच पर स्वांला जीप हादसे और कुछ अन्य घटनाओं ने भी हालात को असामान्य बना दिया। बताते हैं कि संस्था के कुछ लोग कतिपय अधिकारियों पर विभिन्न व्यवस्थाओं को लेकर दबाव भी बना रहे थे। इन कई कारणों से पहले से स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रहे अपर जिलाधिकारी को मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा। सूत्र बताते हैं कि जिले के पांच विभागों के अधिकारी भी कतिपय संस्थाओं की भूमिका को लेकर नाराज चल रहे थे।
सतत विकास कार्यक्रम से जुड़े विभागों को अपने रोजमर्रा के काम के साथ वक्त-बेवक्त अनावश्यक दबावों को भी झेलना पड़ रहा था। दबी-जुबान में चर्चा करने के अलावा इन अधिकारियों ने सार्वजनिक तौर पर कभी कुछ कहा नहीं, मगर अब यह अफसर भी एडीएम के इस्तीफे की चिट्ठी को इसी गहरे दबाव की परिणति मान रहे हैं।
क्या किसी पर कार्रवाई होगी?
सतत विकास कार्यक्रम का भविष्य क्या होगा?, इससे जिले के लोगों को कितना लाभ होगा? ऐसे सवालों का जवाब तो आने वाले वक्त में मिलेगा, मगर प्रशासनिक तौर पर इतनी बड़ी किरकिरी करने वालों के क्रियाकलापों की जांच और उन पर कोई कार्रवाई होगी, इसे लेकर फिलहाल संशय है। अलबत्ता जिलाधिकारी ने परोक्ष में इसके संकेत तो दिए हैं। वहीं आयोजक संस्था के प्रतिनिधि किसी तरह के दबाव के आरोपों को नकारते हुए विभागीय अधिकारियों को किसी तरह आहत करने से इनकार कर रहे हैं।