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सांस्कृतिक मंच नहीं सजने से उत्तरायणी की रौनक पड़ी फीकी
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तब: बागेश्वर में पिछले साल की उत्तरायणी में सांस्कृतिक मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन करते कलाकार। ?
- फोटो : BAGESHWAR
बागेश्वर। सदियों से चले आ रहे मेले को कोरोना के चलते सीमित किए जाने के से उत्तरायणी से चहल-पहल गायब है। नुमाइशखेत मैदान में बने मुख्य मंच से सात दिनों तक चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर रोक है। इसके चलते कला संस्कृति प्रेमियों के साथ ही मेलार्थियों और कलाकारों की उत्तरायणी फीकी हो गई है। दशकों से मेलार्थी मुख्य मंच से होने वाले कार्यक्रमों का आनंद लेते आए हैं, लेकिन इस साल प्रशासन की रोक के बाद उन्हें मायूसी का सामना करना पड़ रहा है।
लोक कला, संस्कृति और उत्तरायणी मेला एक दूसरे के पूरक हैं। प्राचीन समय में मेलों में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोग झोड़ा, चांचरी, भगनौल, छपेली के माध्यम से मनोरंजन करते थे। दर्शक भी इनका आनंद लेते थे। हालांकि उस समय कोई मंच नहीं था। बाजार में जहां भी खाली जगह मिली, महफिल सज जाती थी। नुमाइशखेत मैदान में भी दिन के समय मंच वाले स्थान पर कुछ कार्यक्रम होते थे।
1958 में बागेश्वर को टाउन एरिया का दर्जा मिला। इसके बाद से मेले के स्वरूप में कुछ बदलाव होने शुरू हुए। 1965 में इसे नोटिफाइड एरिया घोषित किया गया। इसके अध्यक्ष नाथ लाल साह ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को मंच प्रदान करने का काम किया। नुमाइशखेत मैदान में रात के समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरूआत के बाद मेले का स्वरूप बदलने लगा। 1970 में नगरपालिका के गठन के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। बाद के सालों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को एक दिन से बढ़ाकर तीन, फिर पांच और वर्तमान समय में सात दिन कर दिया गया है। इस दौरान सुबह दस बजे से देर रात तक रंगारंग कार्यक्रमों का दौर चलता। मकर संक्राति से पूर्व जागरण की रात को सुबह चार बजे तक बाहर से आने वाली भजन मंडली को अपना फन दिखाने का मौका दिया जाता था। मुख्य मंच से होने वाले इन कार्यक्रमों को देखने के लिए जिले के नगरीय क्षेत्र से लेकर दूरस्थ गांवों के लोग भी पहुंचते थे। इस साल कोरोना के चलते सांस्कृतिक मंच सूना पड़ा है। इसका असर ऐतिहासिक मेले पर भी साफ दिख रहा है। (संवाद)
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स्थानीय से लेकर स्टार कलाकार दिखाते थे अपना फन
बागेश्वर। नुमाइशखेत मैदान में सजने वाले सांस्कृतिक मंच से पूर्व में स्थानीय लोक गायक, हुड़का वादक, लोक नृतकों को अपनी कला के प्रदर्शन का मौका मिलता था। बदलते समय के साथ बाहर के कलाकार भी आने लगे। 90 के दशक के बाद बाहरी कलाकारों को बुलाने का चलन बढ़ता चला गया। पिछले 10-12 सालों में बाहरी कलाकारों के लिए स्टार नाइट कार्यक्रम के तहत शाम आठ से रात बाहर बजे की स्पेशल समय सीमा तय कर दी गई। दिन के समय संस्कृति और सूचना विभाग के कलाकारों को मंच प्रदान किया जाता। इसके अलावा स्कूली बच्चे व अन्य स्थानीय कलाकारों को भी दोपहर को अपनी कला दिखाने का अवसर मिलता। वहीं रात को विशेष रूप से आमंत्रित कलाकारों या दलों को मंच सौंपा जाता। जिन्हें देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ती थी।
कई स्टार कलाकार कर चुके हैं शिरकत
बागेश्वर। उत्तरायणी मेले की स्टार नाइट में लोक कला, संस्कृति से जुड़े कई स्टार कलाकार शिरकत कर चुके हैं। प्रदेश के प्रसिद्ध लोक गायक गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, हीरा सिंह राणा, मीना राणा, गजेंद्र राणा, प्रहलाद मेहरा, पप्पू कार्की, गोविंद दिगारी, खुशी जोशी, माया उपाध्याय, फकीरा चंद्र चन्याल, फौजी ललित मोहन जोशी सहित तमाम गायक इस मंच से दर्शकों का मनोरंजन कर चुके हैं। दिल्ली, मुंबई के कलाकार रेेखा राज, संकल्प खेतवाल, पवनदीप राजन भी इस मंच का हिस्सा बन चुके हैं। हास्य जगत में अपना नाम कमाने वाले मंगल सिंह, पवन पहाड़ी, गणेश जोशी भी इस मंच से दर्शकों के चेहरों पर हंसी बिखेर चुके हैं।
सांस्कृतिक मंच ने दी मेले को नई दिशा
सांस्कृतिक मंच से होने वाले कार्यक्रमों ने मेले को एक नई दिशा दी। लोक कलाकार जो गुमनामी में जीते थे, उन्हें लोगों के सामने अपना हुनर दिखाने का मौका मिला। नए-नए कलाकार आगे आने लगे। इस मंच ने कई कलाकारों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने में मदद की है। ऐसे में कोरोना के कारण इस साल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हो पाना कलाकारों और संस्कृति व कला प्रेमियों के लिए निराशाजनक है।
संजय साह जगाती-
रंगारंग कार्यक्रमों से जुड़ी है मेले की रौनक
उत्तरायणी में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम मेले को चार चांद लगा देते हैं। पूर्व के सालों में सांस्कृतिक मंच से कार्यक्रमों को देखने हर मेलार्थी जाता था। दूर दराज के गांवों से आने वाले लोग दिन के समय घंटों मंच के आगे बैठे रहते। रात के कार्यक्रमों में युवाओं का बोलबाला रहता। सांस्कृतिक मेला न कराने से हर वर्ग के मेलार्थी को मायूसी हुई है। कलाकारों की रोजी-रोटी पर भी इसका असर पड़ा है। पीतांबर पांडेय
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लोक कला, संस्कृति और उत्तरायणी मेला एक दूसरे के पूरक हैं। प्राचीन समय में मेलों में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोग झोड़ा, चांचरी, भगनौल, छपेली के माध्यम से मनोरंजन करते थे। दर्शक भी इनका आनंद लेते थे। हालांकि उस समय कोई मंच नहीं था। बाजार में जहां भी खाली जगह मिली, महफिल सज जाती थी। नुमाइशखेत मैदान में भी दिन के समय मंच वाले स्थान पर कुछ कार्यक्रम होते थे।
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1958 में बागेश्वर को टाउन एरिया का दर्जा मिला। इसके बाद से मेले के स्वरूप में कुछ बदलाव होने शुरू हुए। 1965 में इसे नोटिफाइड एरिया घोषित किया गया। इसके अध्यक्ष नाथ लाल साह ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को मंच प्रदान करने का काम किया। नुमाइशखेत मैदान में रात के समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरूआत के बाद मेले का स्वरूप बदलने लगा। 1970 में नगरपालिका के गठन के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। बाद के सालों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को एक दिन से बढ़ाकर तीन, फिर पांच और वर्तमान समय में सात दिन कर दिया गया है। इस दौरान सुबह दस बजे से देर रात तक रंगारंग कार्यक्रमों का दौर चलता। मकर संक्राति से पूर्व जागरण की रात को सुबह चार बजे तक बाहर से आने वाली भजन मंडली को अपना फन दिखाने का मौका दिया जाता था। मुख्य मंच से होने वाले इन कार्यक्रमों को देखने के लिए जिले के नगरीय क्षेत्र से लेकर दूरस्थ गांवों के लोग भी पहुंचते थे। इस साल कोरोना के चलते सांस्कृतिक मंच सूना पड़ा है। इसका असर ऐतिहासिक मेले पर भी साफ दिख रहा है। (संवाद)
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स्थानीय से लेकर स्टार कलाकार दिखाते थे अपना फन
बागेश्वर। नुमाइशखेत मैदान में सजने वाले सांस्कृतिक मंच से पूर्व में स्थानीय लोक गायक, हुड़का वादक, लोक नृतकों को अपनी कला के प्रदर्शन का मौका मिलता था। बदलते समय के साथ बाहर के कलाकार भी आने लगे। 90 के दशक के बाद बाहरी कलाकारों को बुलाने का चलन बढ़ता चला गया। पिछले 10-12 सालों में बाहरी कलाकारों के लिए स्टार नाइट कार्यक्रम के तहत शाम आठ से रात बाहर बजे की स्पेशल समय सीमा तय कर दी गई। दिन के समय संस्कृति और सूचना विभाग के कलाकारों को मंच प्रदान किया जाता। इसके अलावा स्कूली बच्चे व अन्य स्थानीय कलाकारों को भी दोपहर को अपनी कला दिखाने का अवसर मिलता। वहीं रात को विशेष रूप से आमंत्रित कलाकारों या दलों को मंच सौंपा जाता। जिन्हें देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ती थी।
कई स्टार कलाकार कर चुके हैं शिरकत
बागेश्वर। उत्तरायणी मेले की स्टार नाइट में लोक कला, संस्कृति से जुड़े कई स्टार कलाकार शिरकत कर चुके हैं। प्रदेश के प्रसिद्ध लोक गायक गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, हीरा सिंह राणा, मीना राणा, गजेंद्र राणा, प्रहलाद मेहरा, पप्पू कार्की, गोविंद दिगारी, खुशी जोशी, माया उपाध्याय, फकीरा चंद्र चन्याल, फौजी ललित मोहन जोशी सहित तमाम गायक इस मंच से दर्शकों का मनोरंजन कर चुके हैं। दिल्ली, मुंबई के कलाकार रेेखा राज, संकल्प खेतवाल, पवनदीप राजन भी इस मंच का हिस्सा बन चुके हैं। हास्य जगत में अपना नाम कमाने वाले मंगल सिंह, पवन पहाड़ी, गणेश जोशी भी इस मंच से दर्शकों के चेहरों पर हंसी बिखेर चुके हैं।
सांस्कृतिक मंच ने दी मेले को नई दिशा
सांस्कृतिक मंच से होने वाले कार्यक्रमों ने मेले को एक नई दिशा दी। लोक कलाकार जो गुमनामी में जीते थे, उन्हें लोगों के सामने अपना हुनर दिखाने का मौका मिला। नए-नए कलाकार आगे आने लगे। इस मंच ने कई कलाकारों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने में मदद की है। ऐसे में कोरोना के कारण इस साल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हो पाना कलाकारों और संस्कृति व कला प्रेमियों के लिए निराशाजनक है।
संजय साह जगाती-
रंगारंग कार्यक्रमों से जुड़ी है मेले की रौनक
उत्तरायणी में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम मेले को चार चांद लगा देते हैं। पूर्व के सालों में सांस्कृतिक मंच से कार्यक्रमों को देखने हर मेलार्थी जाता था। दूर दराज के गांवों से आने वाले लोग दिन के समय घंटों मंच के आगे बैठे रहते। रात के कार्यक्रमों में युवाओं का बोलबाला रहता। सांस्कृतिक मेला न कराने से हर वर्ग के मेलार्थी को मायूसी हुई है। कलाकारों की रोजी-रोटी पर भी इसका असर पड़ा है। पीतांबर पांडेय

अब:इस बार सूना पड़ा बागेश्वर का नुमाइशखेत मैदान। संवाद न्यूज एजेंसी- फोटो : BAGESHWAR