खड़िया का अकूत भंडार, युवाओं को नहीं दे सका रोजगार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले में कुदरत ने खड़िया के रूप में खनिज संपदा का अकूत भंडार दिया है, लेकिन सरकारें इस खड़िया रूपी खनिज संपदा पर आधारित एक भी उद्योग लगा पाने में नाकाम रही हैं। जिस कारण स्थानीय युवाओं को खड़िया से रोजगार नहीं मिल सका है।
बागेश्वर जिले को खड़िया खनन क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। बागेश्वर से प्रतिवर्ष हजारों टन खड़िया खोदकर मैदानी जिलों में पहुंचाई जाती है। खड़िया से सौंदर्य प्रसाधन सहित अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं। बीते कई साल से खड़िया पर आधारित उद्योग लगाने के लिए सरकारें आश्वासन देती रही हैं लेकिन आज तक इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं हो सके हैं।
खड़िया पर आधारित उद्योग लगता तो स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल जाता। वर्तमान में प्रशासन जिस तरीके से खड़िया खनन कर बाहरी जिलों में उसे भेजता है उससे महज नेपाली मजदूरों व चंद खेत मालिकों व वाहन चालकों को ही रोजगार मिल रहा है। उद्योग लगने पर बड़े पैमाने पर युवाओं के लिए रोजगार के दरवाजे खुल सकते हैं।
इन स्थानों पर होता है खड़िया खनन
कांडा, रीमा, दफौट, चौगांवछीना, विजयपुर।
जिले में 90 खदान हैं स्वीकृत
जिला प्रशासन की संस्तुति पर प्रदेश सरकार ने जिले के विभिन्न स्थानों में 90 खड़िया खदान के पट्टे स्वीकृत किए हैं। जिसमें से लगभग 35 खदानें ही वर्तमान में कार्यरत हैं। शेष खदानों में कार्य बंद है। कार्यरत खदानों से ही सरकार को प्रतिवर्ष 10 करोड़ से अधिक का राजस्व मिलता है।
उद्योग से रुक सकता है पलायन
जिले में खड़िया पर आधारित उद्योग लगते तो जिले से पलायन पर रोक लगाने मेें मदद मिल सकती थी। जिले से अधिकांश युवा रोजगार के लिए बाहरी जिलों में पलायन करते हैं। वर्तमान खनन प्रक्रिया से सिर्फ मजदूर तबके को ही रोजगार मिल रहा है। शिक्षित व उच्च शिक्षित युवाओं को इससे खास लाभ नहीं हो रहा है।
जिले में खड़िया खनन से सरकार को प्रतिवर्ष 10 करोड़ से अधिक का राजस्व जाता है। खड़िया पर आधारित उद्योग लगाने में जमीन, ट्रांसपोर्टेशन सहित कई व्यवहारिक दिक्कतें हैं। इस कारण उद्योग लगा पाना संभव नहीं हो रहा है। फिर भी सैकड़ों लोगों को खड़िया खनन से रोजगार मिल रहा है। - रवि नेगी, जिला खान अधिकारी बागेश्वर।