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संस्कृति को हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण से जोड़ना अति जरूरी : प्रो. पाठक
अमर उजाला ब्यूरो बागेश्वर
Updated Sun, 02 Apr 2017 11:15 PM IST
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गरुड़ में शेखर पाठक व्याख्यान देते
- फोटो : अमर उजाला
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प्रोफेसर शेखर पाठक ने कहा कि उत्तराखंड से जैसा हिमालय और कही नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय के स्वरूप जो बदलाव आ रहा है वह खतरे का संकेत दे रहा है। उन्होंने संस्कृति को पर्यावरण से जोड़ने पर बल दिया। कहा कि प्रस्तावित पंचेश्वर जैसे बांध और निर्माणाधीन सुरंग उत्तराखंड के विकास के लिए खतरे की घंटी है।
प्रोफेसर शेखर पाठक अजीम प्रेमजी फाउंडेशन और शिक्षा विभाग की ओर आयोजित उत्तराखंड गाथा विषय पर ब्लॉक सभागार में एक दिवसीय कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हिमालय है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग से हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरण काफी प्रदूषित हो गया है। उन्होंने कहा कि बड़े बांध और सुरंग उत्तराखंड के लिए खतरे है। उत्तराखंड की विधान सभा सीटों का जब भी परिसीमन हो उस समय भौगोलिक स्थिति को ध्यान देने पर बल दिया। भौगोलिक परिवेश को ध्यान में नहीं रखा गया तो राज्य में विधान सभा सीटें और कम हो सकती है। प्रो. पाठक ने समूचे उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने हिमालयी क्षेत्र के विकास के लिए नौकरशाहों और राजनेताओं से यहां के भौगोलिक स्वरूप को ध्यान में रखने को कहा। कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते पहाड़ों में भी उत्तर भारत का जैसा मौसम होने लग गया है। मौसम में आए बदलाव से कई वनस्पतियां लुप्त हो चुकी है। जैसा हिमालय उत्तराखंड से दिखता है ऐसा हिमालय और कहीं से नहीं दिखता है। उन्होंने स्लाइड शो के माध्यम से उत्तराखंड वन्य जीवों, खेती, पशु पक्षियों और मानव जीवन के बारे में जानकारी दी।
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जिला शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत ने प्रो. पाठक को उत्तराखंड ही नहीं हिमालयी मूलक का सजग प्रहरी की संज्ञा दी। उन्होंने शिक्षकों से कार्यशाला के दौरान सीखें अनुभवों को हर बच्चें और समाज तक पहुंचाने को कहा। वहां अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के अमित, विपिन जोशी, दीपिका श्रीवास्वत, उमेश जोशी, नीरज पंत, प्रेमा भट्ट, नीता अल्मिया, सुरेश सती, ललित पाठक, लक्ष्मण पुरी, गोपाल प्रसाद आदि थे।
प्रोफेसर शेखर पाठक अजीम प्रेमजी फाउंडेशन और शिक्षा विभाग की ओर आयोजित उत्तराखंड गाथा विषय पर ब्लॉक सभागार में एक दिवसीय कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हिमालय है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग से हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरण काफी प्रदूषित हो गया है। उन्होंने कहा कि बड़े बांध और सुरंग उत्तराखंड के लिए खतरे है। उत्तराखंड की विधान सभा सीटों का जब भी परिसीमन हो उस समय भौगोलिक स्थिति को ध्यान देने पर बल दिया। भौगोलिक परिवेश को ध्यान में नहीं रखा गया तो राज्य में विधान सभा सीटें और कम हो सकती है। प्रो. पाठक ने समूचे उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
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उन्होंने हिमालयी क्षेत्र के विकास के लिए नौकरशाहों और राजनेताओं से यहां के भौगोलिक स्वरूप को ध्यान में रखने को कहा। कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते पहाड़ों में भी उत्तर भारत का जैसा मौसम होने लग गया है। मौसम में आए बदलाव से कई वनस्पतियां लुप्त हो चुकी है। जैसा हिमालय उत्तराखंड से दिखता है ऐसा हिमालय और कहीं से नहीं दिखता है। उन्होंने स्लाइड शो के माध्यम से उत्तराखंड वन्य जीवों, खेती, पशु पक्षियों और मानव जीवन के बारे में जानकारी दी।
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जिला शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत ने प्रो. पाठक को उत्तराखंड ही नहीं हिमालयी मूलक का सजग प्रहरी की संज्ञा दी। उन्होंने शिक्षकों से कार्यशाला के दौरान सीखें अनुभवों को हर बच्चें और समाज तक पहुंचाने को कहा। वहां अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के अमित, विपिन जोशी, दीपिका श्रीवास्वत, उमेश जोशी, नीरज पंत, प्रेमा भट्ट, नीता अल्मिया, सुरेश सती, ललित पाठक, लक्ष्मण पुरी, गोपाल प्रसाद आदि थे।