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अपनी भाषा से परहेज कैसा
अमर उजाला ब्यूरो बागेश्वर।
Updated Fri, 19 Jan 2018 11:16 PM IST
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उत्तरायणी मेले में राज्य कि विभिन्न हिस्सों से पहुंचे लोक कलाकार कुमाऊंनी भाषा को राज्यभाषा नहीं मिलने पर चिंतित हैं। लोक गायक आनंद कोरंगा ने लोगों से अपनी भाषा के संरक्षण और उसे बोलने में परहेज न करने की बात कही। कलाकारों ने कहा कि जहां कुमाऊंनी गीतों के मंच सजे हों। वहां मंच का संचालन भी इसी भाषा में होना चाहिए। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों से बढ़ते पलायन पर गंभीर चिंता जताई।
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नदी गांव स्थित राधाकृष्ण होटल में गायक कोरंगा ने अमर उजाला से हुई बातचीत में कहा कि सरकार को कुमाऊंनी भाषा को राज्यभाषा का दर्जा शीघ्र देना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग कुमाऊंनी गीत सुनते हैं। अच्छा लगने पर कलाकारों का ताली बजाकर उत्साहवर्द्धन भी करते हैं, लेकिन कई लोग बोलचाल में इस भाषा से परहेज करते हैं जोकि चिंता का विषय है।
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प्रकृति ने उत्तराखंड को बहुत कुछ दिया है। यहां स्थित हिमालय, कलकल करती नदियां, सुंदर आबोहवा, खेत खलिहान, झरने, बांज बुरांश और देवदार के पेड़ लोगों को बरबस अपनी ओर खींचते हैं। यहां फिल्म की शूटिंग की तमाम संभावनाएं हैं। गांवों के सड़क से जुुड़ने, शिक्षा और स्वास्थ की अच्छी सुविधा होने और रोजगार के उपक्रम लगने से यहां से हो रहे पलायन पर काफी हद तक अंकुश लग सकता है। कहा कि लोक कलाकारों, प्राचीन संस्कृति को संरक्षण मिलना भी जरूरी है।
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संगीत को अनिवार्य विषय बनाया जाना चाहिए। स्टार गायक सुरेश चंद्र सुरीला ने कहा कि तेज रफ्तार जिंदगी के चलते नॉन स्टॉप गीतों का प्रचलन भी बढ़ रहा है। इससे संगीत की आत्मा खोखली हो रही है। वहां अन्य कलाकारों में तारा पथनी, रमेश कोरंगा, जवाहर कोरंगा, गोविंद पंवार, हरू नैनवाल, प्रह्लाद मेहरा, गोविंद कोरंगा, कुुंदन कोरंगा और विन्नी महर आदि थे।