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ओक टसर रेशम कीट पालन में आजीविका खोज रहे कपकोट के ग्रामीण

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Tue, 12 Apr 2022 12:00 AM IST
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Farming of Oak Tasar in Kapkot
कपकोट के फरसाली गांव में इस तरह से स्थानीय बांज के पत्तों पर हो रहा रेशम कीट पालन। विज्ञप्ति - फोटो : BAGESHWAR
बागेश्वर। कपकोट तहसील क्षेत्र के ग्रामीण स्वरोजगार भी अपना रहे हैं। क्षेत्र में कीवी, मशरूम समेत ओक टसर रेशम कीट पालन भी किया जा रहा है। संजीवनी संस्था इस मुहिम में किसानों का सहयोग कर रही है। क्षेत्र के करीब 30 ग्रामीणों ने रेशम कीट पालन का काम शुरू कर दिया है। जल्द ही झूनी और खलझूनी जैसे दूरस्थ गांवों के लोग भी इस मुहिम से जुड़ेंगे।
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ओक टसर रेशम कीट पालन के लिए मणिपुरी बांज की जरूरत होती है। इसे देखते हुए क्षेत्र के गांवों में मनरेगा योजना के माध्यम से मणिपुरी बांज की पैदावार बढ़ाई है। फिलहाल ग्रामीण स्थानीय बांज के पेड़ों पर ही रेशम कीट का पालन कर रहे हैं। संजीवनी संस्था के फील्ड सुपरवाइजर विनोद सिंह घुघत्याल ने बताया कि स्थानीय बांज के पत्ते पर कीट को तैयार होने में 35 से 40 दिन का समय लगता है। अभी योजना की शुरुआत फरसाली, चौड़ा, हरकोट, मल्लादेश, मिकिला खलपट्टा, तिमलाबगड़, लाथी, गुलेर, कनौली, सिमगढ़ी आदि जनजाति वाले गांवों में किया जाना है। फिलहाल फरसाली, चौड़ा, हरकोट, सिमगढ़ी, मल्लादेश में रेशम कीट पालन का काम शुरू हो गया है। जल्द ही अन्य चयनित गांवों में भी मुहिम चलेगी।
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संस्थान उपलब्ध कराएगी कीट, ग्रामीणों से खरीदेगी कोकून
बागेश्वर। ओक टसर रेशम कीटपालन करने के इच्छुक लोगों का चयन कर संस्था उन्हें लार्वा कीट दिलाएगी। बांज के पत्तों को खाकर लार्वा कीट बढ़ेगा और धीरे-धीरे कोकून में बदलेगा। कोकून बनने के बाद संस्था प्रति पीस के हिसाब से कोकून खरीदेगी और ग्रामीण को कीट पालन करने का मेहनताना मिल जाएगा। सुपरवाइजर घुघत्याल ने बताया कि कोकून की खरीद गुणवत्ता के अनुसार की जाती है। इसके तहत अधिकतम दो रुपये प्रति पीस तक मिल सकता है। ग्रामीण जितना अधिक उत्पादन करेंगे, उतना ही अधिक कीट पालन से मुनाफा कमा सकेंगे।
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