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लोनिवि के 80 लाख हड़पने वाले कंपनी मालिकों की सजा बरकरार 

Fri, 24 Nov 2017 10:01 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बागेश्वर।
ब्यूरो/अमर उजाला, बागेश्वर। Updated Fri, 24 Nov 2017 10:01 PM IST
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Lonevi retains the penalty for company owners who grab 80 million
अदालत। - फोटो : amar ujala

फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत कर लोक निर्माण विभाग से सड़क चौड़ीकरण का अनुबंध करने वाली कंपनी की स्वामी और उसके पति की सजा अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने बरकरार रखी है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा पूर्व में दिए गए फैसले को सही मानते हुए याचियों की अपील खारिज कर दी।

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मामले के अनुसार वर्ष 2010 में कपकोट ब्लॉक के सौंग मोटर मार्ग का चौड़ीकरण होना था। इसके लिए कोटद्वार पौड़ी गढ़वाल की एसएन कंस्ट्रक्शन कंपनी से करार हुआ। अनुबंध के लिए कंपनी के मालिकों स्नेहलता चौहान और अखिलेश चौहान ने 16.40 लाख की एफडीआर कोटद्वार पीएनबी की प्रस्तुत की। जबकि 50 लाख की बैंक गारंटी पीएनबी रोशनाबाद हरिद्वार के नाम से दी।
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इसके बाद सड़क का काम शुरू कर प्रथम किस्त के तौर पर लोनिवि से 80 लाख रुपये ले लिए। लेकिन, कुछ समय बाद काम छोड़ दिया। काम नहीं होने पर एक साल के बाद विभाग हरकत में आया। विभाग ने जब कंपनी के प्रपत्रों की जांच की तो एफडीआर और बैंक गारंटी फर्जी पाए गए। इस पर लोनिवि के सहायक अभियंता नंदन सिंह माजिला ने 25 मार्च 2012 को कपकोट थाने में धारा 467, 468, 471 और 420 के तहत केस दर्ज कराया। 
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यह मामला सीजेएम की अदालत में गया। वर्ष 2015 में अदालत ने इस मामले में स्नेहलता को धारा 467 में एक वर्ष का सश्रम कारावास व 10 हजार की सजा, धारा 468 में एक वर्ष का कारावास और पांच हजार का अर्थदंड, धारा 471 में छह माह का कारावास और पांच हजार की सजा और 420 में एक वर्ष का कारावास और पांच हजार की सजा सुनाई गई।

अर्थदंड अदा नहीं करने पर दो माह के अतिरिक्त कारावास की सजा सुनाई गई। इसी तरह अखिलेश चौहान को धारा 420 में दो वर्ष के सश्रम कारावास व पांच हजार अर्थदंड, धारा 467 में तीन वर्ष और 10 हजार रुपये और धारा 468 में तीन वर्ष के कारावास व पांच हजार रुपये के अर्थदंड की सजा और 471 में दो वर्ष का कारावास और पांच हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी।


मामले में आरोपियों की ओर से अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत में अपील की गई। शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए अपर सत्र न्यायाधीश शमशेर अली ने निचली अदालत के फैसले को सही मानते हुए अपील खारिज कर दी। 

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