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पिरूल से बनाएं कोयला
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर।
Updated Mon, 25 Jan 2016 12:13 AM IST
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उत्तराखंड विकेंद्रीकृत जलागम विकास परियोजना (ग्राम्या) के क्षेत्रों में चीड़ की सूखी पत्तियाें (पिरूल) से कोयला बनाने की पहल शुरू हो गई है। यह मशीन जहां ग्रामीणों के आय का स्रोत बनेगी वहीं यह श्रम न्यूनीकरण के लिए भी नया साधन बनेगी। ग्राम्या ने अपने 47 ग्राम पंचायतों में 41 मशीनें बांट दी हैं।
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उत्तराखंड की पहाड़ियों में चीड़ के वन बड़े भू भाग में फैले हुए हैं। पिरूल का उपयोग यहां जानवरों के बैठने, मक्खी, मच्छरों से उनकी सुरक्षा के लिए धुआं करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा ग्रामीण परिवेश में पिरूल का कोई सही उपयोग नहीं है।
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वनागिभन जैसी दुर्घटनाओं को बढ़ाने में पिरूल का बड़ा योगदान है। यह पर्यावरण संतुलन को गड़बड़ाने के साथ ही जलस्रोतों पर भी बुरा असर डालता है। ग्राम्या ने अपने कार्यक्षेत्र के 47 गांवों में से 41 गांवों में पिरूल से कोयला बनाने की मशीनें बांटी हैं।
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कम वजन वाली इन मशीनों को घरेलू बिजली से चलाकर तीन क्विंटल पिरूल से 120 किलो कोयला तैयार होता है। ग्राम्या के लोहारखेत यूनिट अधिकारी मोहन चंद्र भट्ट ने बताया कि कोयला बनाने के लिए पिरूल को पहले एक विशेष ड्रम में जलाया जाता है।
ड्रम के भीतर कम आक्सीजन की स्थिति में जलाने के कारण पिरूल पूरी तरह राख नहीं होता। यह चारकोल में बदल जाता है। इसके बाद 10 प्रतिशत गोबर का घोल बनाकर चारकोल को आटे की तरह गूंथ लिया जाता है। उस मिश्रण को पाइन ब्रिकेट मोल्डिंग मशीन में डालकर आसानी से कोयला बनाया जाता है।
जिसे सुखाकर विशेष रूप से बने ब्रिकेट को ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। मशीन में दो हॉर्सपावर की क्षमता वाली मोटर लगी है जिसे घरेलू बिजली से आसानी से चलाया जा सकता है। मशीन से एक घंटे में करीब 50 किलो तक कोयला बनाया जा सकता है।
150 किलो पिरूल से लगभग 40-50 किलो सूखा ब्रिकेट मिल जाता है। जिससे करीब एक एलपीजी गैस सिलेंडर के बराबर ऊष्मा प्राप्त होती है। आईआईटी रुड़की ने इस कोयले की ऊष्मा शक्ति 5885 प्रति किलो कैलोरी मापी है, जो लकड़ी से 97 प्रतिशत ज्यादा है। एक किलो कोयला करीब एक से डेढ़ घंटे तक जलता है।
ग्राम्या के लोहाखेत यूनिट अधिकारी एमसी भट्ट ने बताया कि पिरूल से कोयला बनाने से होने वाले लाभ की जानकारी दी। ग्रामीणों ने उन्नत चूल्हों के माध्यम से इसका उपयोग दैनिक ईंधन के लिए किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि यदि पिरूल से कोयला बनाने से दावाग्नि से बचाव, वनों पर दबाव कम कर स्थानीय पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होना, आय का अच्छा स्रोत होने से खास तौर पर महिलाओं के समूह के लिए एक सामाजिक व्यवसाय बनने के साथ ही श्रम न्यूनीकरण का नया साधन भी बनकर सामने आ रहा है।