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उच्च हिमालयी क्षेत्र की धरोहर है देवताओं को अर्पित होने वाला ब्रह्मकमल
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बागेश्वर के कुंवारी स्थित शंभू बुग्याल में खिले ब्रह्मकमल। विज्ञप्ति
- फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। जिले को कुदरत ने कई खूबसूरत नेमतों से नवाजा है। इन्हीं नेमतों में कपकोट तहसील के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पैदा होने वाला ब्रह्मकमल भी शामिल है। 3000 से 4500 मीटर की ऊंचाई पर खिलाने वाला यह पुष्प भगवान शिव और मां नंदा की पूजा में अर्पित किया जाता है। कपकोट के बदियाकोट और लीती गांव की नंदाष्टमी पूजा में भी ब्रह्मकमल से मां नंदा की पूजा करने का विधान है। देवपूजा के अलावा इस पुष्प का दवाओं के रूप में भी उपयोग होता है। इससे इसका दोहन बढ़ रहा है और फूलों की संख्या घट रही है।
राज्यपुष्प ब्रह्मकमल का वानस्पतिक नाम सोसुरिया अबवेलेटा है। जिले में यह बदियाकोट, बोरबलड़ा और कुंवारी क्षेत्र से लगे शंभू बुग्याल और लीती के नंदाकुंड और देवीकुंड आदि बुग्यालों में होता है। भाद्रपद की नंदाष्टमी को बदियाकोट और लीती गांव के मां भगवती मंदिर में नंदाष्टमी पूजा का आयोजन किया जाता है। इस पूजा में ग्रामीण मां नंदा को ब्रह्मकमल अर्पित करते हैं।
पूजा से एक सप्ताह पूर्व गांव से ब्रह्मकमल लाने के लिए भक्तों का दल रवाना हो जाता है। इसे हाथ की बजाय लकड़ी से तोड़ा जाता है। नंदाष्टमी के दिन पुष्प को मंदिर में लाकर सामूहिक रूप से देवी मां को अर्पित किया जाता है। पूजा के अलावा इसका उपयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, वात, पाचन संबंधी परेशानी, चोट और जले के उपचार के लिए बनने वाली औषधि में इसका उपयोग होता है। साज-सज्जा में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
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हिमायली क्षेत्रों की खूबसूरती बढ़ाने वाले देव पुष्प पर बढ़ते उपयोग, ग्लेशियरों के सिकुड़ने और उत्पादन में कमी के कारण संकट के बादल मंडराने लगे हैं। ग्लेशियरों की ओर लोगों का बढ़ता रुझान, ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव का असर ब्रह्मकमल पर दिख रहा है। वहीं औषधीय उपयोग के चलते इस पुष्प का दोहन भी बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियरों की सैर पर जाने वाले यात्री भी ब्रह्मकमल को ले जाने का मोह नहीं छोड़ पाते, इससे पर्याप्त मात्रा में इसके बीज नहीं बन पाते हैं। ब्रह्म कमल फूलों की संख्या साल दर साल घट रही है।
महाभारत से जुड़ा है फूल का संबंध
बागेश्वर। देवपुष्प ब्रह्मकमल का वर्णन महाभारत काल की पौराणिक कथा में भी मिलता है। वनवास के दौरान द्रोपदी अलकनंदा नदी में स्नान कर रही थी, तभी उसने नदी की धारा में एक सुंदर पुष्प को बहते हुए देखा। जो अचानक ही ओझल हो गया। द्रोपदी ने भीम से फूल को लाने का आग्रह किया। भीम उस फूल को ढूंढकर लाए और द्रोपदी ने उसे भगवान को अर्पित कर दिया।
माना जाता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से नाम जुड़ने के कारण भी इसका नाम ब्रह्मकमल पड़ा। जिले में नंदा देवी की ब्रह्मकमल से पूजा की जाती है, वहीं प्रदेश के गढ़वाल मंडल में भगवान केदारनाथ और बद्रीनाथ जी को ब्रह्मकमल अर्पित किया जाता है। नंदा राजजात यात्रा में भी यह पुष्प मां नंदा को अर्पित किया जाता है।
उच्च हिमायली क्षेत्रों में पाए जाने वाले ब्रह्मकमल को राज्य पुष्प का दर्जा तो मिला, लेकिन इसके संरक्षण के लिए ठोस पहल करने की जरूरत है। धार्मिक कार्यों के अलावा औषधीय रूप से भी इसका उपयोग होता है। वर्तमान में पुष्प का बढ़ता दोहन इसके अस्तित्व के लिए संकट बनता जा रहा है। ब्रह्मकमल को संरक्षित करने के लिए फूल के अनियमित दोहन को रोका जाना बेहद जरूरी है।
डॉ. नवीन जोशी, एमडी आयुर्वेद, आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय देहरादून।
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राज्यपुष्प ब्रह्मकमल का वानस्पतिक नाम सोसुरिया अबवेलेटा है। जिले में यह बदियाकोट, बोरबलड़ा और कुंवारी क्षेत्र से लगे शंभू बुग्याल और लीती के नंदाकुंड और देवीकुंड आदि बुग्यालों में होता है। भाद्रपद की नंदाष्टमी को बदियाकोट और लीती गांव के मां भगवती मंदिर में नंदाष्टमी पूजा का आयोजन किया जाता है। इस पूजा में ग्रामीण मां नंदा को ब्रह्मकमल अर्पित करते हैं।
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पूजा से एक सप्ताह पूर्व गांव से ब्रह्मकमल लाने के लिए भक्तों का दल रवाना हो जाता है। इसे हाथ की बजाय लकड़ी से तोड़ा जाता है। नंदाष्टमी के दिन पुष्प को मंदिर में लाकर सामूहिक रूप से देवी मां को अर्पित किया जाता है। पूजा के अलावा इसका उपयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, वात, पाचन संबंधी परेशानी, चोट और जले के उपचार के लिए बनने वाली औषधि में इसका उपयोग होता है। साज-सज्जा में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
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हिमायली क्षेत्रों की खूबसूरती बढ़ाने वाले देव पुष्प पर बढ़ते उपयोग, ग्लेशियरों के सिकुड़ने और उत्पादन में कमी के कारण संकट के बादल मंडराने लगे हैं। ग्लेशियरों की ओर लोगों का बढ़ता रुझान, ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव का असर ब्रह्मकमल पर दिख रहा है। वहीं औषधीय उपयोग के चलते इस पुष्प का दोहन भी बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियरों की सैर पर जाने वाले यात्री भी ब्रह्मकमल को ले जाने का मोह नहीं छोड़ पाते, इससे पर्याप्त मात्रा में इसके बीज नहीं बन पाते हैं। ब्रह्म कमल फूलों की संख्या साल दर साल घट रही है।
महाभारत से जुड़ा है फूल का संबंध
बागेश्वर। देवपुष्प ब्रह्मकमल का वर्णन महाभारत काल की पौराणिक कथा में भी मिलता है। वनवास के दौरान द्रोपदी अलकनंदा नदी में स्नान कर रही थी, तभी उसने नदी की धारा में एक सुंदर पुष्प को बहते हुए देखा। जो अचानक ही ओझल हो गया। द्रोपदी ने भीम से फूल को लाने का आग्रह किया। भीम उस फूल को ढूंढकर लाए और द्रोपदी ने उसे भगवान को अर्पित कर दिया।
माना जाता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से नाम जुड़ने के कारण भी इसका नाम ब्रह्मकमल पड़ा। जिले में नंदा देवी की ब्रह्मकमल से पूजा की जाती है, वहीं प्रदेश के गढ़वाल मंडल में भगवान केदारनाथ और बद्रीनाथ जी को ब्रह्मकमल अर्पित किया जाता है। नंदा राजजात यात्रा में भी यह पुष्प मां नंदा को अर्पित किया जाता है।
उच्च हिमायली क्षेत्रों में पाए जाने वाले ब्रह्मकमल को राज्य पुष्प का दर्जा तो मिला, लेकिन इसके संरक्षण के लिए ठोस पहल करने की जरूरत है। धार्मिक कार्यों के अलावा औषधीय रूप से भी इसका उपयोग होता है। वर्तमान में पुष्प का बढ़ता दोहन इसके अस्तित्व के लिए संकट बनता जा रहा है। ब्रह्मकमल को संरक्षित करने के लिए फूल के अनियमित दोहन को रोका जाना बेहद जरूरी है।
डॉ. नवीन जोशी, एमडी आयुर्वेद, आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय देहरादून।