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कला शिक्षक डॉ. दफौटी ने खोले रोजगार के द्वार
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बागेश्वर में कलांजय वर्कशाप में चीड़ के बगेट से बनी कलाकृतियां। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। राजकीय इंटर कॉलेज सलानी (गरुड़) में कार्यरत कला शिक्षक डॉ. हरीश दफौटी ने कलांजय मुहिम चलाई है। इसके तहत काष्ठकला को देशभर में पहचान दिलाई है। अब वह इस कला के जरिये कोरोना काल में घर लौटे प्रवासी युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने में जुट गए हैं।
यह मुहिम पहले जीआईसी सलानी के कला कक्ष तक सीमित एक कार्यशाला थी। इसने अति दुर्गम इस विद्यालय को कला और शिल्प के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाई। शिक्षक चीड़ के पेड़ से निकले निष्प्रयोज्य बगेट से सुंदर कलाकृति बनाकर विद्यार्थियों को इसका हुनर सिखाते हैं। शिक्षक दफौटी इन दिनों जिला मुख्यालय के भागीरथी स्थित अपने घर पर कोरोना काल में दिल्ली से लौटे गरुड़ के लमचूला निवासी प्रमोद शिवाशीष और मनोज राम को प्रशिक्षण दे रहे हैं। डॉ. दफौटी बताते हैं कि उनके शिष्य प्रमोद राष्ट्रीय कला उत्सव प्रतियोगिता में राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। गरीबी के कारण प्रमोद रोजगार के लिए दिल्ली चला गया था। जहां वह इंडिकेटर बनाने वाली कंपनी में मात्र छह हजार रुपये महीने की पगार पर काम करता था।
वह दिल्ली में बीमार पड़ गया था। प्रमोद ने उन्हें व्यथा बताई तो उन्होंने उसके इलाज और किराए के लिए रुपये भेजे। उसे कलांजय से जोड़कर बगेट शिल्प, पपरमैस्सी, टेराकोटा, मुखौटा कला आदि का प्रशिक्षण दिया। रिंगाल शिल्प में वह पहले से ही दक्ष था। शिक्षक ने अपने घर के बरामदे को बंद कर निजी खर्च से कलांजय वर्कशॉप और सेलिंग सेंटर शुरू किया है। डॉ. दफौटी बताते हैं कि उनके पास बदरीनाथ, केदारनाथ, बागनाथ मंदिर की प्रतिकृति की ऑनलाइन मांग आती है। कहते हैं कि जनप्रतिनिधियों का सहयोग मिला तो यह कला यहां के बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार का प्रमुख जरिया बन सकती है।
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यह मुहिम पहले जीआईसी सलानी के कला कक्ष तक सीमित एक कार्यशाला थी। इसने अति दुर्गम इस विद्यालय को कला और शिल्प के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाई। शिक्षक चीड़ के पेड़ से निकले निष्प्रयोज्य बगेट से सुंदर कलाकृति बनाकर विद्यार्थियों को इसका हुनर सिखाते हैं। शिक्षक दफौटी इन दिनों जिला मुख्यालय के भागीरथी स्थित अपने घर पर कोरोना काल में दिल्ली से लौटे गरुड़ के लमचूला निवासी प्रमोद शिवाशीष और मनोज राम को प्रशिक्षण दे रहे हैं। डॉ. दफौटी बताते हैं कि उनके शिष्य प्रमोद राष्ट्रीय कला उत्सव प्रतियोगिता में राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। गरीबी के कारण प्रमोद रोजगार के लिए दिल्ली चला गया था। जहां वह इंडिकेटर बनाने वाली कंपनी में मात्र छह हजार रुपये महीने की पगार पर काम करता था।
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वह दिल्ली में बीमार पड़ गया था। प्रमोद ने उन्हें व्यथा बताई तो उन्होंने उसके इलाज और किराए के लिए रुपये भेजे। उसे कलांजय से जोड़कर बगेट शिल्प, पपरमैस्सी, टेराकोटा, मुखौटा कला आदि का प्रशिक्षण दिया। रिंगाल शिल्प में वह पहले से ही दक्ष था। शिक्षक ने अपने घर के बरामदे को बंद कर निजी खर्च से कलांजय वर्कशॉप और सेलिंग सेंटर शुरू किया है। डॉ. दफौटी बताते हैं कि उनके पास बदरीनाथ, केदारनाथ, बागनाथ मंदिर की प्रतिकृति की ऑनलाइन मांग आती है। कहते हैं कि जनप्रतिनिधियों का सहयोग मिला तो यह कला यहां के बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार का प्रमुख जरिया बन सकती है।
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