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उत्तर की काशी है बागनाथ का मंदिर
Bageshwar
Updated Thu, 27 Feb 2014 05:31 AM IST
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बागेश्वर। सरयू, गोमती और विलुप्त सरस्वती के संगम पर स्थित भगवान बागनाथ का मंदिर क्षेत्र के लोगों के श्रद्धा का केंद्र है। भोलेनाथ यहां माता पार्वती के साथ निवास करते हैं। महाशिवरात्रि, मकर संक्रांति के अलावा अन्य पर्वों पर मंदिर में जलार्पण करने वालों का यहां सैलाब उमड़ पड़ता है।
शिव पुराण के मानस खंड के अनुसार इस नगर को शिव के गण चंडीश ने शिवजी की इच्छा के अनुसार बसाया था। चंडीश द्वारा बसाए गया नगर शिव को भा गया और उन्होंने नगर को उत्तर की काशी का नाम दिया। पहले मंदिर बहुत छोटा था। बाद में चंद वंशीय राजा लक्ष्मी चंद्र ने 1602 में मंदिर को भव्य रूप दिया। पुराण के अनुसार अनादिकाल में मुनि वशिष्ठ अपने कठोर तपबल से ब्रह्मा के कमंडल से निकली मां सरयू को ला रहे थे। यहां ब्रह्मकपाली के समीप ऋषि मार्कण्डेय तपस्या में लीन थे। वशिष्ट जी को उनकी तपस्या को भंग होने का खतरा सताने लगा। देखते देखते वहां जल भराव होने लगा। सरयू आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने शिवजी की आराधना की। शिवजी ने बाघ का रूप रख कर पार्वती को गाय बना दिया और ब्रह्मकपाली के समीप गाय पर झपटने का प्रयास किया। गाय के रंभाने से मार्कण्डेय मुनि की आंखें खुल गई। व्याघ्र को गाय को मुक्त करने के लिए जैसे ही दौड़े तो व्याघ्र ने शिव और गाय ने पार्वती का रूप धरकर मार्कण्डेय को दर्शन देकर इच्छित वर दिया और मुनि वशिष्ठ को आशीर्वाद दिया। इसके बाद सरयू आगे बढ़ सकी। बागनाथ मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्री से पूजा होती है। कुमकुम, चंदन, बछड़े और बताशे चढ़ाने की भी परंपरा है। खीर और खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। बागनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी रावल जाति के लोग होते हैं, जबकि अनुष्ठान कराने वाले पुरोहित चौरासी के पांडे होते थे, बाद में उन्होंने यह काम छोड़ दिया और अपने रिश्तेदार चौरासी के जोशी लोगों को यह काम सौंप दिया।
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शिव पुराण के मानस खंड के अनुसार इस नगर को शिव के गण चंडीश ने शिवजी की इच्छा के अनुसार बसाया था। चंडीश द्वारा बसाए गया नगर शिव को भा गया और उन्होंने नगर को उत्तर की काशी का नाम दिया। पहले मंदिर बहुत छोटा था। बाद में चंद वंशीय राजा लक्ष्मी चंद्र ने 1602 में मंदिर को भव्य रूप दिया। पुराण के अनुसार अनादिकाल में मुनि वशिष्ठ अपने कठोर तपबल से ब्रह्मा के कमंडल से निकली मां सरयू को ला रहे थे। यहां ब्रह्मकपाली के समीप ऋषि मार्कण्डेय तपस्या में लीन थे। वशिष्ट जी को उनकी तपस्या को भंग होने का खतरा सताने लगा। देखते देखते वहां जल भराव होने लगा। सरयू आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने शिवजी की आराधना की। शिवजी ने बाघ का रूप रख कर पार्वती को गाय बना दिया और ब्रह्मकपाली के समीप गाय पर झपटने का प्रयास किया। गाय के रंभाने से मार्कण्डेय मुनि की आंखें खुल गई। व्याघ्र को गाय को मुक्त करने के लिए जैसे ही दौड़े तो व्याघ्र ने शिव और गाय ने पार्वती का रूप धरकर मार्कण्डेय को दर्शन देकर इच्छित वर दिया और मुनि वशिष्ठ को आशीर्वाद दिया। इसके बाद सरयू आगे बढ़ सकी। बागनाथ मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्री से पूजा होती है। कुमकुम, चंदन, बछड़े और बताशे चढ़ाने की भी परंपरा है। खीर और खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। बागनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी रावल जाति के लोग होते हैं, जबकि अनुष्ठान कराने वाले पुरोहित चौरासी के पांडे होते थे, बाद में उन्होंने यह काम छोड़ दिया और अपने रिश्तेदार चौरासी के जोशी लोगों को यह काम सौंप दिया।
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