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जान जोखिम में डालकर एकत्र की गई घास को बचाने की चुनौती
Updated Sun, 18 Feb 2018 10:48 PM IST
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बागेश्वर। जान जोखिम में डालकर एकत्र की गई सूखी घास के लुट्टों को वनों की आग से बचाना ग्रामीणों के लिए चुनौती बना हुआ है। वन्य क्षेत्रों के निकट स्थित कई गांवों में लोगों को घास बचाने के लिए रात को जागकर निगरानी करनी पड़ती है। फायर सीजन में जंगल की आग से हर साल हजारों मूल्य की घास जलकर नष्ट हो जाती है।
मालूम हो कि कृषि और पशुपालन से जुड़े परिवारों की महिलाएं खतरनाक पहाड़ियों से जान जोखिम में डालकर घास एकत्रित करती हैं। शीतकाल में पशु चारे के उपयोग के लिए घरों के आसपास इस घास के लुट्टे बनाए जाते हैं। एक घास के लुट्टे की कीमत आठ से 10 हजार रुपये तक होती है। वन्य क्षेत्रों से लगे गांवों में इन घास के लुट्टों की सुरक्षा भी किसी चुनौती से कम नहीं होती है। वर्षाकाल शुरू होने तक ग्रामीण पशुपालकों को वनाग्नि की चपेट में आने के भय के कारण रात को भी निगरानी करनी पड़ती है। इस साल बारिश कम होने से ग्रामीण पशुपालकों की यह चुनौती और अधिक बढ़ गई। नवंबर में ही वनों में आग लगने की घटनाएं होने से ग्रामीणों को घास के लुट्टों को बचाने के लिए रात भर जागना पड़ रहा। पशुपालक गोपाल सिंह ने बताया कि जंगल की आग से घास के लुट्टों को बचाना हर साल चुनौती भरा रहता है। कई बार आग खेतों तक भी पहुंच जाती है। उन्होंने बताया कि इस साल नवंबर से घास की सुरक्षा में लगे हैं।
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मालूम हो कि कृषि और पशुपालन से जुड़े परिवारों की महिलाएं खतरनाक पहाड़ियों से जान जोखिम में डालकर घास एकत्रित करती हैं। शीतकाल में पशु चारे के उपयोग के लिए घरों के आसपास इस घास के लुट्टे बनाए जाते हैं। एक घास के लुट्टे की कीमत आठ से 10 हजार रुपये तक होती है। वन्य क्षेत्रों से लगे गांवों में इन घास के लुट्टों की सुरक्षा भी किसी चुनौती से कम नहीं होती है। वर्षाकाल शुरू होने तक ग्रामीण पशुपालकों को वनाग्नि की चपेट में आने के भय के कारण रात को भी निगरानी करनी पड़ती है। इस साल बारिश कम होने से ग्रामीण पशुपालकों की यह चुनौती और अधिक बढ़ गई। नवंबर में ही वनों में आग लगने की घटनाएं होने से ग्रामीणों को घास के लुट्टों को बचाने के लिए रात भर जागना पड़ रहा। पशुपालक गोपाल सिंह ने बताया कि जंगल की आग से घास के लुट्टों को बचाना हर साल चुनौती भरा रहता है। कई बार आग खेतों तक भी पहुंच जाती है। उन्होंने बताया कि इस साल नवंबर से घास की सुरक्षा में लगे हैं।
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