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राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए 55 शोध पत्र
Updated Sat, 17 Nov 2018 12:05 AM IST
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बागेश्वर। सार्वजनिक शिक्षा पर जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुल 55 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। शोध पत्रों का पुस्तिका के लिए चयन किया गया।
डायट मेें आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए शोध पत्र की समीक्षा की गई। डॉ. सीएम जोशी की अध्यक्षता में तकनीकी समिति का गठन किया गया। संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश से तीन, राजस्थान से दो, मध्य प्रदेश से दो, दिल्ली से चार, हरियाणा से छह, उत्तराखंड से 35, हिमांचल से नौ शोध पत्र, सार्वजनिक शिक्षा, नवाचारी शिक्षा, मूल्य शिक्षा, लोक संस्कृति आदि विषयों के मायने विषय प्रस्तुत किए गए।
सलाहकार मंडल की बैठक में निर्णय लिया गया कि शोध पत्र को मंथन पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया जाएगा। समीक्षा बैठक में प्रभारी प्राचार्य डॉ. शैलेेंद्र धपोला, डॉ. सीएम जोशी, डॉ. राजीव जोशी, डॉ. केएस रावत, रवि जोशी, भैरव दत्त पांडे, डॉ. प्रेम सिंह मावड़ी, आद्या प्रसाद सिंह, केपी चंदोला, संदीप जोशी, केएन जोशी, मनोज कुमार, आनंद बिष्ट आदि थे। अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच के सचिव लोकेश मालती ने कहा कि सरकारी नीतियां शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर रही हैं जिन देशों में सार्वजनिक शिक्षा की उपेक्षा की गई वहां समाज प्रगति नहीं कर सकता है।
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डायट मेें आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए शोध पत्र की समीक्षा की गई। डॉ. सीएम जोशी की अध्यक्षता में तकनीकी समिति का गठन किया गया। संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश से तीन, राजस्थान से दो, मध्य प्रदेश से दो, दिल्ली से चार, हरियाणा से छह, उत्तराखंड से 35, हिमांचल से नौ शोध पत्र, सार्वजनिक शिक्षा, नवाचारी शिक्षा, मूल्य शिक्षा, लोक संस्कृति आदि विषयों के मायने विषय प्रस्तुत किए गए।
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सलाहकार मंडल की बैठक में निर्णय लिया गया कि शोध पत्र को मंथन पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया जाएगा। समीक्षा बैठक में प्रभारी प्राचार्य डॉ. शैलेेंद्र धपोला, डॉ. सीएम जोशी, डॉ. राजीव जोशी, डॉ. केएस रावत, रवि जोशी, भैरव दत्त पांडे, डॉ. प्रेम सिंह मावड़ी, आद्या प्रसाद सिंह, केपी चंदोला, संदीप जोशी, केएन जोशी, मनोज कुमार, आनंद बिष्ट आदि थे। अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच के सचिव लोकेश मालती ने कहा कि सरकारी नीतियां शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर रही हैं जिन देशों में सार्वजनिक शिक्षा की उपेक्षा की गई वहां समाज प्रगति नहीं कर सकता है।
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