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Almora News: अंग्रेजों से लोहा लिया, लेकिन अपनी सरकार में गुमानमी का दंश झेल रहे स्व. जगाती
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कुंदन लाल साह जगाती। फाइल फोटो
- फोटो : RANIKHET
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द्वाराहाट (अल्मोड़ा)। देश की आजादी की लड़ाई में भागीदारी करने के बावजूद भी आज तक कई स्वतंत्रता सेनानी गुमनाम हैं, इसी क्रम में मूल रूप से बागेश्वर निवासी कुंदन लाल साह (जगाती) पुत्र परमा साह भी शामिल हैं। उनके परिजन द्वाराहाट में रहते हैं और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा दिए जाने को लेकर संघर्षरत हैं। साह का जन्म 1885 में हुआ था।
आंदोलन के समय नजरबंद रहने वालों में साह भी थे। उस दौरान साह का गुरुद्वारे से लगा आवास आंदोलनात्मक रणनीतियों का प्रमुख केंद्र रहा था। 1923 से 1947 तक वह कई बार जेल गए। 1924 में उन्हें चार बार जेल हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बागेश्वर आगमन पर उन्होंने उनके स्वागत की व्यापक तैयारियां की और अंग्रेजों के आदेशों को दरकिनार कर अपने आवास पर क्रांतिकारियों को भोजन कराया, इससे आक्रोशित तत्कालीन डीएम ने उन्हें बागेश्वर छोड़ने के निर्देश दिए लेकिन उन्होंने आदेश नहीं माने।
बौखलाकर हुकूमत ने उन्हें डेढ़ साल की सजा सुनाते हुए बरेली जेल में नजरबंद कर दिया। वहां की यातना और प्रताड़नाओं से वह काफी कमजोर हो गए तथा आजादी के चार वर्ष बाद 1951 में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद भी उन्हें वह सम्मान नही मिला जिसके वह हकदार थे। जगाती के निधन के बाद उनकी पत्नी का भी निधन हो गया।
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1975 में अल्मोड़ा के तत्कालीन जिलाधिकारी सुशील त्रिपाठी अध्यक्ष स्मारिका समिति द्वारा प्रकाशित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारिका में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के जन्म परिचय तहत पृष्ठ 12 में कुंदन लाल साह पुत्र परमा साह का नाम दर्ज है। वही बागेश्वर में कोतवाली के बाहर लगे शिलापट में स्वतंत्रता संग्राम के शहीद एवं सेनानी में दूसरे नंबर पर कुंदन लाल का नाम दर्ज है, लेकिन बार बार शासन प्रशासन को पत्र भेजने के बावजूद जगाती की उपेक्षा ही हुई है और उन्हें आज तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा नहीं मिल पाया है। उनके प्रपौत्र उमेश लाल साह के पास उनके कई दस्तावेज मौजूद हैं। परिजनों ने शासन प्रशासन से उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा देने की मांग की है।
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आंदोलन के समय नजरबंद रहने वालों में साह भी थे। उस दौरान साह का गुरुद्वारे से लगा आवास आंदोलनात्मक रणनीतियों का प्रमुख केंद्र रहा था। 1923 से 1947 तक वह कई बार जेल गए। 1924 में उन्हें चार बार जेल हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बागेश्वर आगमन पर उन्होंने उनके स्वागत की व्यापक तैयारियां की और अंग्रेजों के आदेशों को दरकिनार कर अपने आवास पर क्रांतिकारियों को भोजन कराया, इससे आक्रोशित तत्कालीन डीएम ने उन्हें बागेश्वर छोड़ने के निर्देश दिए लेकिन उन्होंने आदेश नहीं माने।
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बौखलाकर हुकूमत ने उन्हें डेढ़ साल की सजा सुनाते हुए बरेली जेल में नजरबंद कर दिया। वहां की यातना और प्रताड़नाओं से वह काफी कमजोर हो गए तथा आजादी के चार वर्ष बाद 1951 में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद भी उन्हें वह सम्मान नही मिला जिसके वह हकदार थे। जगाती के निधन के बाद उनकी पत्नी का भी निधन हो गया।
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1975 में अल्मोड़ा के तत्कालीन जिलाधिकारी सुशील त्रिपाठी अध्यक्ष स्मारिका समिति द्वारा प्रकाशित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारिका में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के जन्म परिचय तहत पृष्ठ 12 में कुंदन लाल साह पुत्र परमा साह का नाम दर्ज है। वही बागेश्वर में कोतवाली के बाहर लगे शिलापट में स्वतंत्रता संग्राम के शहीद एवं सेनानी में दूसरे नंबर पर कुंदन लाल का नाम दर्ज है, लेकिन बार बार शासन प्रशासन को पत्र भेजने के बावजूद जगाती की उपेक्षा ही हुई है और उन्हें आज तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा नहीं मिल पाया है। उनके प्रपौत्र उमेश लाल साह के पास उनके कई दस्तावेज मौजूद हैं। परिजनों ने शासन प्रशासन से उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा देने की मांग की है।