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Almora News: कुमाऊं-तिब्बत के रिश्तों को गहराई से समझने की जरूरत
Wed, 03 Sep 2025 11:27 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
Updated Wed, 03 Sep 2025 11:27 PM IST
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रानीखेत में सेना के दीवान सिंह सभागार में आयोजित संगोष्ठी में मौजूद लोग। स्रोत: सेना
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। सेना के दीवान सिंह सभागार में कुमाऊं रेजीमेंट केंद्र की ओर से बुधवार को आपस में जुड़ी जड़ें: साझा भारत-तिब्बती विरासत विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि जीओसी-इन-सी सेंट्रल कमांड ले. जनरल अनिन्द्य सेनगुप्ता ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
वक्ताओं ने कुमाऊं और तिब्बत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक रिश्तों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने इस साझे संबंध को गहराई से समझने और आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने पर बल दिया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत और तिब्बत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्तों को गहराई से समझना और उन्हें सुरक्षित रखना था।
वक्ताओं ने भारतीय और तिब्बती कला, स्थापत्य, परंपरा और लोक संस्कृति को साझा धरोहर बताते हुए सामरिक और सामाजिक महत्ता पर भी चर्चा की। समापन पर जीओसी यूबी एरिया ले. जनरल डीजी मिश्रा ने कहा कि यह संगोष्ठी आपसी सहयोग को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण कदम है।
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केआरसी कमांडेंट ब्रिगेडियर संजय कुमार यादव ने बताया कि इसमें सेना के साथ-साथ स्थानीय स्कूलों ने भी भाग लिया। गोष्ठी में सैन्य अधिकारियों, पूर्व सैनिकों, शिक्षाविदों, विश्व विद्यालयों के प्राध्यापकों तथा नेपाल से आए विशिष्ट अतिथियों ने प्रतिभाग किया।
बौद्ध संस्कृति, हिमालय और पारिस्थितिकी पर विमर्श
रानीखेत (अल्मोड़ा)। साहित्य व संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. माया जोशी ने बौद्ध धर्म, हिमालयी संस्कृति और राहुल सांकृत्यायन के योगदान पर प्रकाश डाला। पद्मश्री फोटोग्राफर अनूप साह ने हिमालय-तिब्बत के दुर्लभ दृश्य, पर्यावरण संरक्षण और विश्वस्तरीय प्रदर्शनों के अनुभव साझा किए। अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ डॉ. मेधा बिष्ट ने जल कूटनीति और दक्षिण एशियाई राजनीति पर जानकारी दी। इतिहास शोधकर्ता राजेंद्र सिंह रावल ने कुमाऊं-नेपाल सांस्कृतिक रिश्तों और लोककला-लोकसाहित्य की परंपरा पर विचार रखे। पर्यावरणविद प्रो. अनिल जोशी ने हिमालयी पारिस्थितिकी, जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण समाज की चुनौतियों पर चर्चा की। सेवानिवृत्त मेजर जनरल डा. एसबी आस्थाना और ब्रिगेडियर रूमेल दहिया ने भी विचार व्यक्त किए।
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वक्ताओं ने कुमाऊं और तिब्बत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक रिश्तों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने इस साझे संबंध को गहराई से समझने और आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने पर बल दिया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत और तिब्बत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्तों को गहराई से समझना और उन्हें सुरक्षित रखना था।
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वक्ताओं ने भारतीय और तिब्बती कला, स्थापत्य, परंपरा और लोक संस्कृति को साझा धरोहर बताते हुए सामरिक और सामाजिक महत्ता पर भी चर्चा की। समापन पर जीओसी यूबी एरिया ले. जनरल डीजी मिश्रा ने कहा कि यह संगोष्ठी आपसी सहयोग को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण कदम है।
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केआरसी कमांडेंट ब्रिगेडियर संजय कुमार यादव ने बताया कि इसमें सेना के साथ-साथ स्थानीय स्कूलों ने भी भाग लिया। गोष्ठी में सैन्य अधिकारियों, पूर्व सैनिकों, शिक्षाविदों, विश्व विद्यालयों के प्राध्यापकों तथा नेपाल से आए विशिष्ट अतिथियों ने प्रतिभाग किया।
बौद्ध संस्कृति, हिमालय और पारिस्थितिकी पर विमर्श
रानीखेत (अल्मोड़ा)। साहित्य व संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. माया जोशी ने बौद्ध धर्म, हिमालयी संस्कृति और राहुल सांकृत्यायन के योगदान पर प्रकाश डाला। पद्मश्री फोटोग्राफर अनूप साह ने हिमालय-तिब्बत के दुर्लभ दृश्य, पर्यावरण संरक्षण और विश्वस्तरीय प्रदर्शनों के अनुभव साझा किए। अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ डॉ. मेधा बिष्ट ने जल कूटनीति और दक्षिण एशियाई राजनीति पर जानकारी दी। इतिहास शोधकर्ता राजेंद्र सिंह रावल ने कुमाऊं-नेपाल सांस्कृतिक रिश्तों और लोककला-लोकसाहित्य की परंपरा पर विचार रखे। पर्यावरणविद प्रो. अनिल जोशी ने हिमालयी पारिस्थितिकी, जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण समाज की चुनौतियों पर चर्चा की। सेवानिवृत्त मेजर जनरल डा. एसबी आस्थाना और ब्रिगेडियर रूमेल दहिया ने भी विचार व्यक्त किए।