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स्याल्दे बिखौती मेला द्वाराहाट में झलकी कुमाउंनी लोक संस्कृति।

Wed, 15 Apr 2015 11:38 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला ब्यूरो/ द्वाराहाट (अल्मोड़ा)
ब्यूरो, अमर उजाला ब्यूरो/ द्वाराहाट (अल्मोड़ा) Updated Wed, 15 Apr 2015 11:38 PM IST
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Syalde Bikuti snippet in Dwarahat Kumaonis folk culture festival.

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जरूरी सुविधाओं, संसाधनों, रोजगार के अभाव में बढ़ते पलायन पर लगाम नहीं लग पा रही है। इसी पीड़ा को इंगित करते लोकगायकों के झोड़ों के बोल स्याल्दे बिखौती में हर मेलार्थी को झकझोर रहे हैं।

उत्तराखंड के शहीदों की कुर्बानियों समेत कमोबेश सभी उत्तराखंडवासियों के आंदोलन के बदौलत 14 साल पहले राज्य तो बन गया, लेकिन जनता के सपनों का राज्य बनना अभी बाकी है। राज्य निर्माण की मूल मंशा गांवों के अंतिम छोर तक सड़क निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, पेयजल, विद्युत जैसी सुविधाओं का विस्तार था, लेकिन राज्य बनने के 14 साल बाद भी लोग मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। रही-सही कसर जंगली जानवरों ने पूरी कर दी है।
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लोग इस पीड़ा को ज्ञापन, मांगपत्रों के साथ ही गाहे-बगाहे मेलों में झोड़ा, चांचरी, भगनौल, जोड़ आदि से भी अभिव्यक्त करते रहे हैं। इसी समस्या को इंगित करता मैनोली निवासी बुजुर्ग टीकाराम उपाध्याय द्वारा बनाया गया झोड़ा ‘च्याल ब्वारियां दिली न्हैगेईं घर रै गो छ बुड़, खेती बाड़ी य बांजी है गे छ खाली रैगईं कुड़’ के बोल हर सुनने वाले को झकझोर रहे हैं।
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पहाड़ की इस असल पीड़ा का प्रतिनिधित्व करते इस झोडे़ के बोल यदि सीएम साहब ने सुने होंगे तो उनका माथा भी जरूर ठनका होगा। हालांकि सीएम हरीश रावत ने भी अपने भाषणों में पलायन, जंगली जनवरों की समस्या पर गहरी चिंता जताई थी।

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